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नशे में धुत, खून के प्यासे, AK-47 और RPG से लैस दो हज़ार से अधिक लड़ाके.....गांव के भीतर 30,000 निर्दोष नागरिक औरतें, बच्चे, बूढ़े जिन्हें काट डालने की तैयारी थी.....

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 नशे में धुत, खून के प्यासे, AK-47 और RPG से लैस दो हज़ार से अधिक लड़ाके.....गांव के भीतर 30,000 निर्दोष नागरिक औरतें, बच्चे, बूढ़े जिन्हें काट डालने की तैयारी थी..... उनके और मौत के बीच खड़ी था भारतीय सेना का एक छोटा-सा दस्ता। क्यूंकि बाकी लोगों को आने का रास्ता उग्रवादियों ने बंद कर रखा था।..... एक कहानी भारतीय सेना की  किसी शोर में नहीं, शौर्य में लिखी गई थी।  आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे  मलाकाल बैटल, दक्षिण सूडान की  कहानी जानकर,जहाँ 40 भारतीय सैनिक 2,000 हत्यारों के सामने खड़े थे।  जहाँ दुश्मन नरसंहार के इरादे से आया था, और भारतीय सेना ने उसे घुटनों पर ला दिया। दक्षिण सूडान का मलाकाल गांव  जहां पर संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना ने‌ चारों ओर घेरा डाल रखा था,पर  अचानक से उनके सामने  आतंकी “व्हाइट आर्मी”  खड़ी थी। मलाकाल वालों को लगा कि अब सब खत्म हैं।लेकिन वे भूल गए थे कि उनको बचाने उनके गांव के दरवाज़े पर कौन खड़ा है। वो भारतीय सेना की टुकड़ी थी। इस युद्ध को तब लीड कर रहे थे मेजर समर तूर (8 राजपूताना राइफल्स) जब इतने आक्रामक लडा़को को ...

हेडगेवार के 'राइट हैंड' अप्पाजी जोशी, तस्वीर लगाकर तिलक की पूजा करते थे

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 हेडगेवार के 'राइट हैंड' अप्पाजी जोशी, तस्वीर लगाकर तिलक की पूजा करते थे संघ के एक कार्यकर्ता थे अप्पाजी जोशी. लोकमान्य तिलक से इनका खूब लगाव था.1906 में जब उन्हें पता चला कि तिलक जिस ट्रेन से जा रहे हैं, वो वर्धा स्टेशन से गुजरने वाली है, तो शिक्षक के मना करने के बावजूद वो तिलक को देखने स्टेशन चले गए थे,बाद में छड़ी से पिटाई भी खाई.  ये तीसरे दिल्ली दरबार से जुड़ी कहानी है, तीसरा दरबार 1911 में दिल्ली में लगा था, जब राजा जॉर्ज पंचम और रानी विक्टोरिया भारत आए थे. ऐसे में सभी ब्रिटिश आधीन भारतीय राजा महाराजाओं को तो उनके दरबार में हाजिरी देनी ही थी, देश भर के सभी बड़े ब्रिटिश अधिकारियों और भारत की भी ऐसी कई हस्तियों को आमंत्रित किया गया था, जो अपने अपने क्षेत्र में शिखर पर थे, और अंग्रेजी राज के प्रशंसक थे. इलाहाबाद के जाने माने वकील मोतीलाल नेहरू भी आए थे और वो संयुक्त प्रांत के इकलौते आमंत्रित वकील थे, वो भी पूरे परिवार के साथ. सबसे दिलचस्प था इस खास मौके के लिए मोतीलाल का जवाहर को निर्देश देकर लंदन से अपने लिए खास कपड़े सिलवाकर मंगवाना. मोतीलाल स्पेशल ट्रेन से लखनऊ से दिल्ली...

ऐसे हुई थी 'सेवा भारती' की स्थापना, पीएम मोदी से भी जुड़ता है एक लिंक

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 ऐसे हुई थी 'सेवा भारती' की स्थापना, पीएम मोदी से भी जुड़ता है एक लिंक दिल्ली का तिमारपुर. एक पिछड़ी बस्ती में अपनी नौकरी छोड़ चुका एक इंजीनियर बच्चों को अंग्रेजी, गणित और विज्ञान पढ़ा रहे थे. इन बच्चों के नतीजे बहुत अच्छे थे. इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ने वाले ये शख्स विष्णुजी थे. सेवा भारती की बुनियाद में विष्णुजी का अहम योगदान है. जब पूरा देश आपातकाल में लगने वाली पाबंदियों से त्रस्त था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई नेता प्रतिबंध के चलते या तो जेल में थे या फिर भूमिगत रहकर आंदोलन को दिशा दे रहे थे, उसी समय संघ प्रमुख बालासाहब देवरस एक नए संगठन की योजना बना रहे थे. ऐसा संगठन जिसका ना कोई राजनैतिक उद्देश्य हो और ना ही कोई उस पर इस तरह का आरोप ही लगा सके. 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटाकर इंदिरा गांधी सरकार ने चुनाव करवाने का ऐलान किया और इधऱ संघ के दिल्ली के स्वयंसेवक दिल्ली गेट के पास फुटबॉल स्टेडियम में एक सभा में जुटे थे. उस सभा में बालासाहब ने कहा कि, “संघ एक ऐसा समरस समाज विकसित करना चाहता है, जहां किसी के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होगा. समरस एवं समृद्ध समाज भाषणों...

जब योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता ने अटल बिहारी वाजपेयी को भी क्षणभर के लिए विस्मित कर दिया…

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 जब योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता ने अटल बिहारी वाजपेयी को भी क्षणभर के लिए विस्मित कर दिया… वो दृश्य आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास में एक अद्भुत अध्याय की तरह दर्ज है। स्थान था महाराजगंज, समय था जब भारतीय राजनीति अनुभव और युवा ऊर्जा के बीच सेतु खोज रही थी। भारत रत्न, युगपुरुष, श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी चुनावी सभा को संबोधित करने पहुँचे थे। चारों ओर जनसैलाब था — दूर-दराज़ के गाँवों से आए कार्यकर्ता, साधारण किसान, युवा, माताएँ, बुज़ुर्ग… सब एक ही उद्देश्य से आए थे — अपने नेताओं को सुनने। सभा सामान्य ढंग से आगे बढ़ रही थी… लेकिन तभी मंच से एक युवा साधु ने माइक संभाला — नाम था योगी आदित्यनाथ। जैसे ही योगी आदित्यनाथ ने बोलना शुरू किया, महाराजगंज की धरती पर कुछ ऐसा घटा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। पूरा माहौल अचानक बदल गया। हवा में एक अलग ही ऊर्जा तैरने लगी। चारों दिशाओं से एक ही गूँज उठी— “योगी! योगी! योगी!” नारे इतने प्रबल, इतने स्वतःस्फूर्त और इतने भावनात्मक थे कि मंच पर बैठे कई वरिष्ठ नेता एक-दूसरे की ओर देखकर आश्चर्य से भर उठे। यह कोई योजनाबद्ध नारा नहीं था, यह जनता के दिल ...

हमारे बाला साहब- दत्तोपंत ठेंगड़ी प. पू. बालासाहब के

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  Dattopant Thengadi हमारे बाला साहब दत्तोपंत ठेंगड़ी  प. पू. बालासाहब के साथ कई दशको तक घनिष्ठ संबंध रहा । ऐसे मेरे जैसे व्यक्ति के लिये आज के इस अवसर पर कुछ भी बोलना कितना कठिन है इसकी कल्पना आप कर सकते है । शायद यदि किसी को कल्पना न होगी तो अपनी भावनाओं के बारे में हमारे मान्यवर जगजीत सिंह जी ने जो बताया कि प्रगट करना बहुत कठिन हो जाता है । उसी का अनुभव मैं ले रहा हूँ । जैसा कहा गया कि खामोश गुप्तगूं है “आज बेजुबाँ है जबाँ मेरी” हम में से बहुत सारे लोगों की अवस्था इस समय एसी ही होगी, ऐसा में समझता हूँ । किन्तु एक कर्तव्य के नाते इस समय पर कुछ बोलना है इसी नाते बोलने का साहस कर रहा हूँ । यह मासिक स्मृति दिन मनाया जा रहा है । मा. सरकार्यवाह श्री. शेषाद्री जी के आदेश के अनुसार ‘सामाजिक समरसता’ दिन इस नाते इसको हम मना रहे है । बालासाहेब का पूरा जीवन हमारे सामने है । His life was an open book कई नेताओं का जीवन इतना open नही रहता । बालासाहब का जीवन open book जैसा जीवन रहा । जीवन के अंतिम चरण में विकलांग अवस्था के कारण उनको कितनी असुविधा बर्दाश्त करनी पडी, कष्ट बर्दाश्त करने पडे, ...