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जब बैन की काट के तौर पर ABVP के बैनर तले होती थीं RSS की बैठकें

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जब बैन की काट के तौर पर ABVP के बैनर तले होती थीं RSS की बैठकें बलराज मधोक, दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे नेताओं ने एबीवीपी की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी. ये तब की बात है जब संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर या तो जेल में थे या फिर वे संघ पर प्रतिबंध हटाने के लिए लड़ रहे थे. प्रतिबंध के चलते संघ के अधिकारी उन दिनों जो गुप्त बैठकें करते थे वो भी एबीवीपी के बैनर तले ही करते थे. राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ साल से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ज्यादा नजर रखी जाने लगी है. उसकी वजह भी है. पिछले ढाई दशक में जितने भी बीजेपी के बड़े चेहरे सामने आए हैं, उनमें से ज्यादातर की पृष्ठभूमि एबीवीपी की रही है. चाहे फिर वो अमित शाह हों या फिर अरुण जेटली, जेपी नड्डा हों या सुनील बंसल, मोहन यादव हों या फिर पुष्कर सिंह धामी. संघ के सहयोगी संगठनों में भी विद्यार्थी परिषद के पुराने नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी जा रही हैं. संघ की कोर टीम से सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले हों या प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर, दोनों विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रह चुके हैं. वहीं एबीवीपी...

कर्नाटक हाइकोर्ट ने शुक्रवार को RSS नेता प्रभाकर भट्ट के खिलाफ दर्ज FIR की जांच पर अंतरिम रोक लगाई

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कर्नाटक हाइकोर्ट ने शुक्रवार को RSS नेता प्रभाकर भट्ट के खिलाफ दर्ज FIR की जांच पर अंतरिम रोक लगाई। यह FIR पुत्तूर के एक कॉलेज में दिए गए उनके भाषण से जुड़ी है जिसे बाद में एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किया गया। हाइकोर्ट ने यह राहत सुप्रीम कोर्ट के हालिया उस फैसले का हवाला देते हुए दी, जिसमें सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मामलों में FIR दर्ज करने को लेकर जारी दिशा-निर्देशों को बरकरार रखा गया। प्रभाकर भट्ट ने पुत्तूर टाउन थाने में उनके खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग करते हुए हाइकोर्ट का रुख किया। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 (धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना), 299 (किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से जानबूझकर किया गया कृत्य), 302 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्दों का प्रयोग), 353(2) (सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान) और धारा 3(5) (सामान्य आशय) के तहत मामले दर्ज किए गए। सुनवाई की शुरुआत में प्रभाकर भट्ट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरुणा श्याम ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना राज्य बनाम नल...

'पूरी तरह से गलत': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल जजों द्वारा आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखने की प्रथा की निंदा की

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  'पूरी तरह से गलत': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल जजों द्वारा आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखने की प्रथा की निंदा की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते ट्रायल कोर्ट के जजों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले का हवाला देते समय अपने आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखने की प्रथा की निंदा की। कोर्ट ने इस सिस्टम को "पूरी तरह से गलत" बताया और कहा कि इसकी सराहना नहीं की जा सकती। इसने न्यायिक अधिकारियों को याद दिलाया कि उनके आदेशों में केवल हवाला, केस नंबर और संबंधित टेक्स्ट ही उद्धृत किया जाना चाहिए। जस्टिस समित गोपाल की बेंच ने अपने आदेश में कहा, "यह याद दिलाया जाता है कि फैसले का हवाला देते समय केवल उसका हवाला और/या केस नंबर और पार्टी का नाम और/या फैसले की तारीख के साथ-साथ जिस टेक्स्ट पर भरोसा किया गया है, उसे ही फैसले में उद्धृत और उल्लेख किया जाना चाहिए, जबकि उक्त पेज पर रिवीजनल कोर्ट ने बेंच बनाने वाले माननीय जजों के नाम का उल्लेख किया।" कोर्ट ने इस तरह प्रियांका कुमार द्वारा अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका खारिज की, जिसने सरकारी नौकरी दिलान...

शिक्षा में सुधार काग़जी काम करने से नहीं, शिक्षक को समय और सम्मान लौटाने से होगा।

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 आज बात- *शिक्षक डायरी(दैनांदिनी) भरने की बाध्यता की* शिक्षा विभाग में अनेकों गैर शैक्षणिक कार्य और अनेकों नित नए आदेशों के चलते जब *शिक्षण कार्य पूर्वनिर्धारित ही नहीं तो पूर्व में ही शिक्षक डायरी भरने का क्या औचित्य ???* यह व्यवस्था अब *मात्र कागजी* बनकर रह गई है। इसमें सुधार की व परिवर्तन की महती आवश्यकता है,वैसे भी जब शिक्षा में आमूल चूल परिवर्तन किया जा रहा है, पठन-पाठन की विधि बदली जा रही है, पाठ्यक्रम बदला जा रहा है,नीतियां बदली जा रही है,तो ठेठ पुरानी इस व्यवस्था को क्यों नहीं बदला जा रहा ..!! शिक्षा विभाग के जमीनी स्तर के विशेषज्ञ बताते हैं कि इस व्यवस्था का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है । यह *मात्र एक कागजी खानापूर्ति* है और *शिक्षकों पर* एक *अनावश्यक* लिखित कार्रवाई करने का *बोझ* है।  कोई भी *अधिकारी जी किसी विद्यालय में निरीक्षण के लिए जातें है सबसे पहले शिक्षक डायरी मांगतें है जबकि उसके अनुरूप शिक्षक को ना तो समय दिया जाता है ना ही शिक्षा विभाग का कार्यक्रम चलता है।* इस दिशा में *हिमाचल प्रदेश* द्वारा *सकारात्मक कदम* उठाये जाने की सूचना सुखद है।जिसका *राधाकृष्णन संघ ...

RSS की नींव का वो पत्थर जो बना विवेकानंद शिला स्मारक का ‘शिल्पी’

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RSS की नींव का वो पत्थर जो बना विवेकानंद शिला स्मारक का ‘शिल्पी’ कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला पर स्मारक बनाने का फैसला हुआ. लेकिन इसकी राजनीतिक बाधाएं थी, आर्थिक तो थी ही. इस असंभव से दिखने वाले काम को पूरा करने का जिम्मा दिया गया एकनाथ रानडे को. ध्यान रहे कि तब केंद्र और राज्य दोनों ही जगह संघ विरोधी सरकार थी. ऐसे में एकनाथ रानडे ने अपना कौशल दिखाया. के आर मलकानी अपनी किताब ‘The RSS Story’ में लिखते हैं कि उन दिनों मजाक में एक कहावत चल पड़ी थी कि अगर कभी भी कुतुबमीनार को हटाकर कहीं और लगाने का फैसला किया तो इस भागीरथ काम को बस एक ही आदमी सफलतापूर्वक आसानी से कर सकता है और वो हैं एकनाथ रानडे. संघ के सरकार्यवाह जैसे पद पर रह चुके एकनाथ रानडे को लेकर ये कहावत ऐसे ही नहीं चल पड़ी थी, संघ स्वयंसेवक होते हुए भी संसद में सभी पार्टियों, सभी धर्मों के 323 सांसदों का हस्ताक्षर लाकर केन्द्र और राज्य में संघ विरोधी सरकारों से ईसाई पादरियों के विरोध के बावजूद स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक की अनुमति लेना आसान काम नहीं था. फिर उसके लिए उतना धन जुटाना, जो 8 साल पहले गुरु गोलवलकर के 51वें जन्मदिन पर ...

ओडिशा-बिहार में RSS के खेवनहारों की कहानी

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 ओडिशा-बिहार में RSS के खेवनहारों की कहानी RSS से प्रतिबंध हटने के बाद गुरु गोलवलकर ने उड़ीसा पर भी ध्यान दिया और 1949 में बाबूराम को उड़ीसा का पहला प्रांत प्रचारक बनाकर भेजा. तब वहां केवल चार शाखाएं थीं. उस स्थिति में काम करना एक बड़ी चुनौती थी. उड़ीसा में जनता पार्टी के नीलामणि ने कांग्रेस की लम्बी सरकार का क्रम 1977 में तोड़ दिया था. 2 साल 236 दिन की उनकी सरकार के बाद फिर कांग्रेस आ गई. 1990 में बीजू पटनायक जनता दल से 5 साल मुख्यमंत्री रहे लेकिन फिर कांग्रेस आ गई. सन 2000 से उनके बेटे नवीन पटनायक ऐसे गद्दी पर बैठे कि फिर अगले 24 साल कोई उन्हें हिला नहीं पाया. ऐसे में मोहन चरण मांझी अगर मुख्यमंत्री बने तो ये बीजेपी के लिए क्रांति सरीखा था, ऐसे ही बिहार में भले ही बीजेपी सत्ता पक्ष में अरसे से हो लेकिन अपना मुख्यमंत्री बनाने में आज तक कामयाब नहीं है. इससे साफ पता चलता है कि ये दोनों ही राज्य भगवा परिवार के लिए हमेशा ही दुष्कर रहे हैं.  दत्तोपंत ठेंगड़ी को संघ का रास्ता दिखाने वाले ने उड़ीसा में खड़ा किया संघ उड़ीसा 1936 में एक अलग प्रांत बना तो आरएसएस इस नवगठित प्रांत में प्रवे...

संघ के कुछ प्रचारक थे जो सर्वोच्च पदों तक तो नहीं पहुंचे लेकिन सरसंघचालक उनकी उपयोगिता और योग्यता के चलते उन्हें दूर भी नहीं भेजना चाहते थे

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 RSS की चारदीवारी के चार चक्रधरों की रोचक कहानियां संघ के कुछ प्रचारक थे जो सर्वोच्च पदों तक तो नहीं पहुंचे लेकिन सरसंघचालक उनकी उपयोगिता और योग्यता के चलते उन्हें दूर भी नहीं भेजना चाहते थे. आज आप ऐसे चार स्वयंसेवकों/प्रचारकों की दिलचस्प कहानी जानेंगे. सभी सरसंघचालकों से जुड़ी निजी और दिलचस्प कहानियां जो आप अलग अलग किताबों, लेखों में पढ़ते हैं, वो ज्यादातर इन चारों की वजह से सामने आ पाईं. कई बार संगठन के शीर्ष पर बैठे लोगों को किसी स्वयंसेवक या प्रचारक की योग्यता या जरूरत ऐसी लगती है कि वो उन्हें किसी दुर्गम क्षेत्र में भेजने के बजाय संघ मुख्यालय पर ही रखना चाहते हैं. जैसे डॉ हेडगेवार ने गुरु गोलवलकर को पहले नागपुर की जिम्मेदारी दी, फिर संघ शिक्षा वर्ग का सर्वाधिकारी बनाया और फिर एक महीने के लिए बंगाल भी भेजा, लेकिन उन्हें लगता था कि इतने योग्य व्यक्ति को दूसरा सरसंघचालक होना चाहिए, इसलिए उन्हें सरकार्यवाह बनाकर उनका केन्द्र नागपुर ही कर दिया. गुरु गोलवलकर ने भी बालासाहब देवरस को नागपुर बुलाकर फिर कहीं नहीं भेजा क्योंकि उन्हें पता था कि संगठन को डॉ हेडगेवार के बाद अगर कोई सबसे ज्य...

नवनियुक्त प्रार्चायों को रास नहीं आ रहे यूपी के डिग्री कॉलेज, साल भर में 100 ने दिया इस्तीफा

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 नवनियुक्त प्रार्चायों को रास नहीं आ रहे यूपी के डिग्री कॉलेज, साल भर में 100 ने दिया इस्तीफा उत्तर प्रदेश के डिग्री कॉलेज (degree college) नवनियुक्त प्रार्चार्यों को रास नहीं आ रहा है. इसलिए एक साल में ही 100 से अधिक प्राचार्य (100 out of 290 resigned in a year) ने नौकरी छोड़ दी है. आइए जानते हैं, ऐसा क्या है कारण? सौ प्राचार्य ने छोड़ी नौकरी उत्तर प्रदेश में सरकार की सहायता से चलने वाले डिग्री कॉलेज में नव नियुक्त प्राचार्यों को नई नौकरी भा नहीं रही है. तभी तो एक साल के अंदर 296 में करीब 100 ने अभी तक अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. जबकी इन डिग्री कॉलेज में करीब दो दशक से स्थाई प्राचार्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया साल 2021 में पूरी की गई थी. दरअसल, प्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा आयोग को राज्य में सहायता प्राप्त डिग्री कॉलेज में अस्थाई प्रधानाचार्य के स्थान पर स्थाई प्रधानाचार्य की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी करने को कहा था. सरकार के आदेश के बाद आयोग ने साल 2015 और 2017 में निकल गए अपने विज्ञापन को समायोजित कर साल 2021 में प्रदेश के सभी डिग्री कॉलेज में खाली प्राचार्यों के पदों को भरने...

क्या इस फ़ाइल में नाम आने भर से आप यौन अपराधी बन जाते हैं, नही मगर आप सन्दिग्ध ज़रूर हो जाते हैं

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 क्या इस फ़ाइल में नाम आने भर से आप यौन अपराधी बन जाते हैं, नही मगर आप सन्दिग्ध ज़रूर हो जाते हैं । यह नाबालिग बच्चियों के साथ यौन अपराध ही नही,बल्कि दुनिया भर की डील की भी कलाई खोलती हैं । कैसे  बड़े बड़े राष्ट्राध्यक्ष अपने मतलब की डील व्यापारियों से करते,उसके बदले क्या लेते, क्या देते और कैसे चारा बनती कम उम्र की लड़कियां । यह फ़ाइल हमारे दौर के सबसे घिनौने दस्तावेज़ में से एक है । एप्सटीन फ़ाइल का इंतेज़ार तो सबको था । लाख के करीब तस्वीरों में से अभी सौ भी बाहर नही आई हैं कि दुनिया में हलचल मच गई थी ।।अब तो लाखों दस्तावेज़ ईमेल बाहर आ रहे हैं । कितने ही शराफत के पर्दे उतर रहे हैं  । इसमें नाम भर आ जाना आपको घिनौनेपन के सन्दिग्ध पिंजड़े की तरफ ढकेल देगा । हो सकता है कि यह नाम गुनहगार न हों मगर धुआं तो वहीं होगा,जहां आग होगी । सब कुछ जब तक स्पष्ट नही हों जाता,क्लीनचिट के सर्टिफिकेट भी नही बाटे जा सकते । जेफ़री एप्सटीन के साथ किया गया संवाद,कालिख़ पोतने के लिए काफी है । जेफ़री एप्सटीनएक ऐसा अपराधी जिसका होना कथित सभ्य,अमीर,अरबपति,नेता,लेखक,विचारकों के बुरे कामों पर पर्दा था । मगर यह प...

उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से जुड़े यूजीसी के नियम

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  उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से जुड़े यूजीसी के नियम समता संबंधी नियमों में बदलावों की जरूरत हो सकती है, लेकिन ये आवश्यक हैं गुरुवार को, सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने हेतु नियमों’ को “बहुत व्यापक” करार देकर उन पर रोक लगा दी। जनवरी में अधिसूचित इन नियमों ने परिसरों में भेदभाव के सभी रूपों, खासकर जाति-आधारित, से निपटने की कोशिश की। वर्षों के सक्रियतावाद (एक्टिविज्म), मुकदमेबाजी और राष्ट्र के जमीर को झकझोर देने वाली रोहित वेमुला जैसी दुखद आत्महत्याओं के बाद ये नियम लाये गये। शीर्ष अदालत ने यूजीसी को इन्हें बनाने का आदेश दिया था। इस मुद्दे पर साल 2012 के यूजीसी फ्रेमवर्क को उच्च शिक्षा संस्थानों ने लगभग पूरी तरह अनदेखा कर दिया था। जाति और जाति-आधारित भेदभाव एक हकीकत है जो अब भी बरकरार है और इससे निपटना राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक प्राथमिकता होनी चाहिए। बहुत से विद्यार्थियों ने इसे भुगता है, जिससे उन्हें जीवन भर के जख्म मिले हैं और कई बार जिंदगी तक बर्बाद हो गयी है। यूजीसी के आंकड़े बताते हैं ...