संघ प्रचारक कैसा?
प्र. संघ प्रचारक कैसा? उ.भारत की आत्मा केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं में नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों में निवास करती है। इस आत्मा को ‘मां भारती’ कहा गया—एक ऐसी चेतना, जो युगों से साधकों, तपस्वियों, संन्यासियों और कर्मयोगियों को अपने लिए समर्पण का आह्वान करती रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक इसी परंपरा के आधुनिक प्रतीक हैं। वे कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं, बल्कि ऐसे कर्म-संन्यासी हैं जिन्होंने निजी जीवन, पारिवारिक सुख, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा तक का त्याग कर राष्ट्र को ही अपना परिवार माना। संघ के आजीवन अविवाहित प्रचारक, बाह्य रूप से सामान्य दिखते हैं, किंतु उनके भीतर एक अग्नि जलती रहती है—राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, सेवा और त्याग की। यह लेख उन्हीं प्रचारकों के जीवन-दर्शन, साधना, तप, संघर्ष और योगदान पर केंद्रित है, जिन्होंने मां भारती के लिए स्वयं को पूर्णतः अर्पित कर दिया। 1. प्रचारक की अवधारणा: कर्म में संन्यास भारतीय परंपरा में संन्यास का अर्थ केवल केसरिया वस्त्र धारण करना नहीं रहा। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—“योगः कर्मसु कौशलम्।” अर्थ...