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शीला दीक्षित - पंजाब की मिट्टी से उठकर सत्ता के शिखर तक

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 भारतीय राजनीति में कई कहानियां ऐसी हैं, जो सिर्फ सत्ता, चुनाव और पदों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समय के साथ एक गहरी विडंबना में बदल जाती हैं। Sheila Dikshit की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—एक ऐसी महिला, जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा महिलाओं के अधिकारों, विकास और सामाजिक बदलाव के लिए समर्पित किया, लेकिन अंत में वही मुद्दे उनके राजनीतिक सफर के सबसे बड़े मोड़ बन गए। यह कहानी सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि उस सच्चाई की है, जहां इरादे नेक होते हैं, लेकिन हालात उनका साथ नहीं देते। पंजाब की मिट्टी से उठकर सत्ता के शिखर तक 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में जन्मीं शीला दीक्षित का बचपन एक सामान्य परिवार में बीता, लेकिन उनके सपने सामान्य नहीं थे। पढ़ाई के लिए उन्होंने दिल्ली का रुख किया और दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। यहीं से उनके सोचने का नजरिया बदला—इतिहास पढ़ते-पढ़ते उन्होंने समझा कि बदलाव हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन जरूरी होता है। यही सोच आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की नींव बनी। उनकी शादी विनोद दीक्षित से हुई, जो एक आईएएस अधिकारी थे और एक प्रभावशाली राज...

जिन मामलों में कानून के तहत केवल “परिवाद” (यानी सीधे अदालत में शिकायत) का प्रावधान है, उनमें एफआईआर दर्ज करना गलत है।

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लेखक  एड. सत्येंद्र नाथ श्रीवास्तव  हाई कोर्ट, इलाहाबाद/प्रयागराज राजीव कृष्ण ने हाल ही में पुलिस अधिकारियों को एक अहम निर्देश दिया है। यह निर्देश इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद जारी किया गया, जिसमें साफ कहा गया कि जिन मामलों में कानून के तहत केवल “परिवाद” (यानी सीधे अदालत में शिकायत) का प्रावधान है, उनमें एफआईआर दर्ज करना गलत है। दरअसल, कई बार पुलिस बिना कानूनी प्रावधान देखे ही एफआईआर दर्ज कर लेती है। इससे आरोपी को कोर्ट में फायदा मिल जाता है और पूरी जांच कमजोर पड़ जाती है। इसी गलती को गंभीर मानते हुए डीजीपी ने सभी थानों को चेतावनी दी है कि पहले यह जांच लें कि मामले में एफआईआर बनती भी है या नहीं। नीचे उन सभी अधिनियमों (1 से 32) का संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट विवरण मानवीय अंदाज़ में दिया जा रहा है, ताकि आसानी से समझा जा सके कि इनमें सामान्यतः “परिवाद” (Complaint Case) का प्रावधान क्यों माना जाता है: 1. घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 यह कानून महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक हिंसा से सुरक्षा देता है। इसमें पीड़िता सीधे मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन द...

पानीपत में बन रही राष्‍ट्र को समर्पित RSS की पहली प्रयोगशाला, सौ गांवों को अक्‍टूबर से फायदा

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पानीपत में बन रही राष्‍ट्र को समर्पित RSS की पहली प्रयोगशाला, सौ गांवों को अक्‍टूबर से फायदा पानीपत में संघ की प्रयोगशाला बनाई जा रही है। हरियाणा प्रांत संघचालक पवन जिंदल के नेतृत्व 70 फीसद काम पूरा भी हो चुका है। इससे पानीपत के सौ गांवों को ...और पढ़ें पानीपत में बन रही राष्‍ट्र को समर्पित RSS की पहली प्रयोगशाला, सौ गांवों को अक्‍टूबर से फायदा पानीपत के समालखा जीटी रोड से सटे पट्टीकल्याणा गांव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र निर्माण की भव्‍य प्रयोगशाला बनाई जा रही है। प्रयोगशाला को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसकी खास बात ये है कि आसपास के 100 गांवों को गोद लेकर शिक्षा, चिकित्सा, कृषि व आर्थिकी में समग्र विकास किया जाना है।  समाजिक सहयोग से एकत्र 150 करोड़ रुपये की लागत से 27 एकड़ में इस ‘सेवा साधना केंद्र’ को विकसित करने की जिम्मेदारी हरियाणा प्रांत संघचालक पवन जिंदल संभाल रहे हैं। केंद्र के संचालन व रख रखाव पर आने वाला प्रतिमाह 40 लाख रुपये का खर्च भी समाज ही वहन करेगा। केंद्र या राज्य सरकार पर कोई निर्भरता नहीं होगी।  प्रयोग सफल रहा तो उठाएंगे बड़ा कदम प्रयो...
 पूर्ण विभागीय जांच के बिना कर्मचारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता: गुजरात हाईकोर्ट गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने याचिकाकर्ता की सेवाओं को समाप्त करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की अनुमति देते हुए कहा कि नियोक्ता को काम पर रखने और नौकरी से निकालने की अनुमति नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार नियमित जांच किए बिना कर्मचारी को कदाचार के आधार पर एक झटके में नौकरी से नहीं निकाला जा सकता है। पूरा मामला याचिकाकर्ता, एक जूनियर क्लर्क (प्रशासन), पांच साल के अनुबंध के आधार पर तालुका पंचायत में सेवाओं में लगा हुआ था। याचिकाकर्ता की सेवाओं को भ्रष्टाचार के कारण समाप्त कर दिया गया था जब उसे 3,000 रुपये की राशि स्वीकार करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ जिला विकास अधिकारी के पास अपील दायर की जिसने आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को बहाल करने का निर्देश दिया और उसकी परिवीक्षा अवधि बढ़ा दी। जिला विकास अधिकारी और विकास आयुक्त के बीच कुछ पत्राचार के कारण, एक नए पत्र ने भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण याचिक...

'नो वर्क नो पे' तब लागू नहीं होता, जब अधिकारी कर्मचारी को उसकी गलती के बिना काम से दूर रखते हैं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

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 पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट   'नो वर्क नो पे' तब लागू नहीं होता, जब अधिकारी कर्मचारी को उसकी गलती के बिना काम से दूर रखते हैं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी को पहले गलत तरीके से प्रमोशन न मिलने के बाद रेट्रोस्पेक्टिव या डीम्ड प्रमोशन दिया जाता है तो एम्प्लॉयर “नो वर्क नो पे” के सिद्धांत का इस्तेमाल करके उसे होने वाले पैसे के फायदे देने से मना नहीं कर सकता। कोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी की उस याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें उसने डिपार्टमेंट के आदेशों के उन क्लॉज़ को चुनौती दी थी, जिनमें उसे रेट्रोस्पेक्टिव प्रमोशन देने के बावजूद सैलरी का बकाया देने से मना कर दिया गया। जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा, "'नो वर्क नो पे' का सिद्धांत कोई पक्का नियम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम के.वी. जानकीरमन, (1991) 4 SCC 109 में अधिकार के साथ कहा था कि “नो वर्क नो पे” का सामान्य नियम उन मामलों में लागू नहीं होता, जहां कर्मचारी काम करने को तैयार होने के बावजूद, अधिकारियों द्वारा उसकी बिना किसी गलती के काम से दूर रखा जाता है। ...

भूला हुआ अधिकार

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 भूला हुआ अधिकार भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में, गिरफ्तारी एक प्रक्रियात्मक तंत्र है जिसका उद्देश्य जांच के उद्देश्यों के लिए एक अभियुक्त की उपस्थिति को सुरक्षित करना है। निर्णयों के एक समूह में, माननीय सुप्रीम कोर्ट और देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों ने लगातार यह माना है कि जहां इस उद्देश्य को कम घुसपैठ के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है, जांच एजेंसी को ऐसे विकल्पों को अपनाना चाहिए और अनावश्यक गिरफ्तारियों से बचना चाहिए। इन स्पष्ट न्यायिक घोषणाओं के बावजूद, गिरफ्तारी तेजी से एक प्रक्रियात्मक कदम के बजाय सजा के एक रूप के समान हो गई है। जिस क्षण किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगाया जाता है, उसका नाम, फोटो, निवास स्थान, पारिवारिक पृष्ठभूमि और कथित आचरण को अक्सर निरंतर मीडिया कवरेज के माध्यम से सार्वजनिक डोमेन में रखा जाता है। अदालत के पास सबूतों की जांच करने या बचाव पक्ष को सुनने का अवसर होने से बहुत पहले, आरोपी पर प्रभावी ढंग से मुकदमा चलाया जाता है, दोषी ठहराया जाता है और जनमत की अदालत में सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया जाता है। यहां तक कि जहां अंततः कोई बरी होता है, इस प्रक्रि...

शिक्षकों का नहीं हो पाएगा उत्पीड़न, यूपी सरकार ने कर दी व्यवस्था, ये एक्ट बनेगा सुरक्षा कवच

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 शिक्षकों का नहीं हो पाएगा उत्पीड़न,  यूपी सरकार ने कर दी व्यवस्था,  ये एक्ट बनेगा सुरक्षा कवच एडेड विद्यालयों में प्रबन्धन अब शिक्षकों का उत्पीड़न नहीं कर सकेंगे। यूपी सरकार ने इसको लेकर व्यवस्था कर दी है। इंटरमीडिएट एक्ट की उप धारा-3 क ही उनका सुरक्षा कवच बनकर उनकी सेवा को महफूज रखेगा। शिक्षकों का नहीं हो पाएगा उत्पीड़न, यूपी सरकार ने कर दी व्यवस्था, ये एक्ट बनेगा सुरक्षा कवच यूपी के एडेड विद्यालयों में प्रबन्धन अब शिक्षकों का उत्पीड़न नहीं कर सकेंगे। यूपी सरकार ने इसको लेकर व्यवस्था कर दी है। इंटरमीडिएट एक्ट की उप धारा-3 क ही उनका सुरक्षा कवच बनकर उनकी सेवा को महफूज रखेगा। शासन ने उक्त धारा का स्मरण दिलाते हुए शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियमों में सेवा सुरक्षा का अलग से प्रावधान करने की मांग को औचित्यहीन करार दिया है। इस संबंध में शासन ने सोमवार को सभी जिलों के डीआईओेएस को आदेश भेज दिया है। शासन ने कहा है कि एक्ट की उप धारा-3 (क) ही शिक्षकों का सेवा कवच है, जिसे दरकिनार करना प्रबंधतंत्र और डीआईओएस के लिए बहुत मुश्किल होगा क्योंकि यह उपधारा ही शिक्षकों के सेवा सुरक्षा का स...

रीडर्स से चलने वाला मीडिया ही स्वतंत्र रह सकता है, सरकारी मदद से चलने वाला कॉर्पोरेट मीडिया नहीं: जस्टिस नागरत्ना

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  रीडर्स से चलने वाला मीडिया ही स्वतंत्र रह सकता है, सरकारी मदद से चलने वाला कॉर्पोरेट मीडिया नहीं: जस्टिस नागरत्ना सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार को कहा कि रीडर्स से चलने वाला प्रेस इंडिपेंडेंट रहने के लिए सबसे अच्छी जगह है, उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट ओनरशिप स्ट्रक्चर अक्सर मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन को आर्थिक मदद के ज़रिए सरकारी असर के प्रति कमज़ोर बना देते हैं। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 सेरेमनी में मुख्य भाषण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर देकर कहा कि इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म तभी ज़िंदा रह सकता है जब उसे रीडर्स और सिविल सोसाइटी का सीधा सपोर्ट मिले। उन्होंने कहा, "रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और पॉलिटिकल प्रेशर से बचने के लिए बेहतर जगह पर होता है।" उन्होंने इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग को एक पब्लिक गुड बताया, जिसे सब्सक्रिप्शन के ज़रिए सपोर्ट किया जाना चाहिए। सिविल सोसाइटी को यह समझना चाहिए कि इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग एक पब्लिक गुड है, जिसक...

RSS की शब्दावली में ‘ओटीसी’ क्या है? जानिए संघ में कैसे होती है स्वयंसेवकों की ट्रेनिंग

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 RSS की शब्दावली में ‘ओटीसी’ क्या है? जानिए संघ में कैसे होती है स्वयंसेवकों की ट्रेनिंग आरएसएस के स्वयंसेवक जिस तरह अनुशासित दिखते हैं, उसके लिए उन्हें बाकायदा कई लेवल के ट्रेनिंग दी जाती है. ये ट्रेनिंग कैसे शुरू हुई? ट्रेनिंग कैम्पों का क्या स्ट्रक्चर है? ये 'ओटीसी' क्या बला है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जैसे ही आपका संपर्क बढ़ने लगता है आपको उनके अधिकारियों-स्वयंसेवकों से बातचीत में संगठन की शब्दावली के कुछ शब्द मिलने लगते हैं. ऐसे में उनको लेकर जिज्ञासा भी होती है. संघ में दशकों तक एक शब्द प्रचलन में रहा ओटीसी.  दिलचस्प बात है कि बहुतों को अब भी इसका अर्थ नहीं पता होगा. लेकिन ये पता होगा कि गर्मियों में संघ के जो प्रशिक्षण शिविर लगते हैं, ये शब्द उनके लिए बोला जाता रहा है. हालांकि 1950 के दशक से ही इसका नाम संघ शिक्षा वर्ग यानी (एसएसवी) हो गया है. लेकिन ओटीसी बोलने वाले अभी भी वही बोलते हैं. संघ के इन प्रशिक्षण शिविरों को इतिहास में दो ही बार रोका गया है, एक बार तब जब 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगाया गया और दूसरी बार 1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी का ऐलान किय...

हेडगेवार से भागवत तक, RSS के 6 सरसंघचालक और उनका योगदान

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 हेडगेवार से भागवत तक, RSS के 6 सरसंघचालक और उनका योगदान शाखा आरएसएस की मूल इकाई है, जो सामुदायिक सेवा और शारीरिक व्यायाम जैसे गतिविधियों के लिए जानी जाती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समय के साथ बदलाव अपनाए, लेकिन हिंदू एकता और चरित्र निर्माण इसके मूल में रहे. प्रत्येक सरसंघचालक ने आरएसएस को नई दिशा दी और इसे आधुनिक बनाया. हिंदू समाज को एकजुट करना और लोगों का चरित्र निर्माण उन प्रमुख मूल्यों में से रहे हैं जिनके इर्द-गिर्द आरएसएस 1925 से घूमता रहा है. लेकिन विविध क्षेत्रों से आए इसके सरसंघचालकों ने अपनी कार्यशैली से संगठन पर अमिट छाप छोड़ी है. महाराष्ट्र के एक चिकित्सक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 27 सितंबर 1925 को दशहरा के दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना की थी. उन्होंने आरएसएस की शुरुआत एक शाखा से की थी, जो इन 100 वर्षों में एक विशाल संगठन के रूप में विकसित हुआ.  आरएसएस पर अध्ययन करने वाले पत्रकार सुधीर पाठक के अनुसार, पिछले 100 वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छह सरसंघचालकों या प्रमुखों में से प्रत्येक ने अनेक मुद्दों से निपटने में संगठन के द...

डॉक्टर हेडगेवार ने कर दी थी अंग्रेजों के जासूस की पिटाई

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 डॉक्टर हेडगेवार ने कर दी थी अंग्रेजों के जासूस की पिटाई आजादी के दौर में संघ ने कई क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से खूब सहयोग किया था. चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह के एक साथी की मदद करने के चक्कर में तो डॉ हेडगेवार पर ऐसा केस चल सकता था कि उन्होंने संघ के लिए जो सपने देखे थे वो अधूरे ही रह जाते. आजादी के बाद से ही भारत, महात्मा गांधी के अहिंसा के आह्वान और लगभग हर हिंदू देवी-देवता के हाथों में अस्त्र-शस्त्र की परिकल्पना के बीच झूलता रहा है. ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की सोच स्पष्ट थी कि आत्मरक्षा और देश को आजादी दिलाने के लिए हथियार उठाने में कोई बुराई नहीं है. यही वजह रही कि कोलकाता में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही डॉक्टर हेडगेवार अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए. संघ के स्वयंसेवकों को आत्मरक्षा हेतु दंड (लाठी) चलाने, नियुद्ध (जूडो-कराटे) आदि का प्रशिक्षण देने और विजयदशमी पर स्थापना के दिन शस्त्र पूजा की परम्परा शुरू करने में उनकी यही सोच उभरती है. कई क्रांतिकारियों को आरएसएस गुप्त रूप से सहयोग करता आया था. सुखदेव ने भी अपनी फरारी...

अनुशासनात्मक दंड अपराध के अनुरूप होना चाहिए: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने रिटायर के बाद दी गई सजा में किया संशोधन

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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट  अनुशासनात्मक दंड अपराध के अनुरूप होना चाहिए: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने रिटायर के बाद दी गई सजा में किया संशोधन पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई में लगाया गया दंड सिद्ध कदाचार की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने रिटायरमेंट के बाद वेतनमान में 21 चरणों की कटौती के दंड को अत्यधिक मानते हुए उसमें संशोधन किया। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा, “अनुशासनात्मक कार्यवाही में हस्तक्षेप का दायरा अत्यंत सीमित है। यह स्थापित विधि है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत यह हाइकोर्ट तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब निष्कर्ष मनमाने, असंगत, प्रक्रियात्मक त्रुटि से ग्रस्त या स्पष्ट पूर्वाग्रह से प्रभावित हों। अदालत का दायित्व केवल यह सुनिश्चित करना है कि निष्कर्ष अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से समर्थित हों, कार्यवाही निर्धारित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप हुई हो तथा दंड कदाचार के अनुपात में हो।” अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुपातिकता का सिद्धांत यह मांग करता है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में कर्मचारी पर लगाया गया दंड सिद्ध कदाचार की गं...

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था असभ्यता को पोषित कर रही है उस असभ्यता का एक ही कारण है, शिक्षक को रीढ़ विहीन कर दिया जाना, उसे सरकार और मैनेजमेंट द्वारा नौकर के रूप में डील करना

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 वर्तमान शिक्षा व्यवस्था असभ्यता को पोषित कर रही है उस असभ्यता का एक ही कारण है, शिक्षक को रीढ़ विहीन कर दिया जाना, उसे सरकार और मैनेजमेंट द्वारा नौकर के रूप में डील करना। शिक्षकों को एयरपोर्ट, शौचालय और सांड़ गिनने में लगाकर, फैशन शो की तैयारी का जिम्मा देकर कोई भी समाज यदि सोचता है कि आने वाली पीढ़ी सुशिक्षित होगी तो यह उसका भ्रम है।  हैप्पीनेस क्लास जैसे तमाम पाखंडपूर्ण कार्यक्रमों के चलते पढ़ाई को एकदम मनोरंजन का रूप दिया जा रहा है। निजी कॉलेज और विश्वविद्यालयों को होटल बनाया जा रहा है। इनसे कोई उम्मीद नही कि ये मर्यादा, अनुशासन वाले स्टूडेंट प्रोड्यूस करेंगे।  हमें याद करने की जरूरत है कि जिस सरकारी शिक्षा ने आठवें दशक के अवसान तक गांवों-कस्बों से कनस्तर में उदरपूर्ति और कंधे पर बिस्तरबंद में ओढ़ने-बिछाने का सामान लेकर घर से निकले छात्रों में ही वैज्ञानिक, डाक्टर और इंजीनियर आर्थिक लाचारियों के बावजूद गढ़े थे, वहीं शिक्षा जब मात्र व्यापार के हवाले हो गयी तो  डाक्टर,इंजीनियर बनने के लिए प्रतिस्पर्धा योग्यता की बजाए, पच्चीस-पचास लाख रूपये धनराशि की अनिवार्य शर्त हो गई...
 आसान नहीं थी संघ गणवेश की मूल कमीज, टोपी, बेल्ट और जूतों की विदाई संघ का गणवेश स्वयंसेवकों की पहली बाहरी पहचान है. संघ का मौजूदा ड्रेस कई बदलावों से होकर इस पड़ाव तक पहुंचा है. इस ड्रेस में सबसे बड़ा परिवर्तन 1940 में हुआ था. चीन युद्ध के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की ट्रैफिक प्रबंधन से लेकर रक्तदान और सहायता सामग्री पहुंचाने तक की तत्परता देखकर पंडित जवाहर लाल नेहरू इतने प्रभावित हुए कि उन्हें 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित कर दिया. के आर मलकानी अपनी किताब ‘द आरएसएस स्टोरी’ में लिखते हैं कि नेहरू ने उस वक्त कहा था कि, “Given the spirit, even the Lathi could successfully face the bomb." संघ के 2000 स्वयंसेवकों ने पूरे गणवेश (संघ की यूनीफॉर्म) में उस परेड में भाग लिया था. बिगुल बैंड के साथ संघ स्वयंसेवकों का ये मार्च उस दिन चर्चा का विषय बन गया. लेकिन अगले दिन कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में ये मार्च कुछ अलग वजह से चर्चा में था और वो वजह थी गणवेश. कई सांसदों को तो इसी बात पर ऐतराज था कि संघ को क्यों बुलाया गया? नेहरू ने सभी को ये जवाब देते हुए शांत कर दिया क...