अनुशासनात्मक दंड अपराध के अनुरूप होना चाहिए: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने रिटायर के बाद दी गई सजा में किया संशोधन

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट 

अनुशासनात्मक दंड अपराध के अनुरूप होना चाहिए: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने रिटायर के बाद दी गई सजा में किया संशोधन



पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई में लगाया गया दंड सिद्ध कदाचार की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने रिटायरमेंट के बाद वेतनमान में 21 चरणों की कटौती के दंड को अत्यधिक मानते हुए उसमें संशोधन किया।

जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा,

“अनुशासनात्मक कार्यवाही में हस्तक्षेप का दायरा अत्यंत सीमित है। यह स्थापित विधि है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत यह हाइकोर्ट तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब निष्कर्ष मनमाने, असंगत, प्रक्रियात्मक त्रुटि से ग्रस्त या स्पष्ट पूर्वाग्रह से प्रभावित हों। अदालत का दायित्व केवल यह सुनिश्चित करना है कि निष्कर्ष अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से समर्थित हों, कार्यवाही निर्धारित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप हुई हो तथा दंड कदाचार के अनुपात में हो।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुपातिकता का सिद्धांत यह मांग करता है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में कर्मचारी पर लगाया गया दंड सिद्ध कदाचार की गंभीरता से न्यायोचित और तार्किक संबंध रखे। अत्यधिक या आरोपों की तुलना में असंगत दंड न केवल निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का भी हनन है।

मामला

याचिकाकर्ता ने वर्ष 1979 में एक ग्रामीण बैंक में लिपिक के रूप में सेवा प्रारंभ की थी। बाद में उन्हें अधिकारी श्रेणी-1 में पदोन्नत किया गया। लगभग 35 वर्ष की सेवा के बाद वे 31 मई 2013 को रिटायर हुए।

रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले 3 मई 2013 को उन्हें आरोपपत्र जारी किया गया। आरोप था कि वर्ष 2011 में पल्ला शाखा में प्रतिनियुक्ति के दौरान उन्होंने 42 ऋण प्रस्तावों की अनुचित अनुशंसा की। इनमें से 33 खाते बाद में अनियमित या अतिदेय हो गए। कुल बकाया राशि लगभग 2.72 करोड़ रुपये बताई गई। 14 ऋण कथित रूप से ऋण मानकों के उल्लंघन में अनुशंसित किए गए ।

जांच के बाद 10 में से 4 आरोप सिद्ध पाए गए। अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उनके वेतनमान को 29,700 रुपये से घटाकर 14,500 रुपये कर दिया जो 21 चरणों की कटौती थी। रिटायरमेंट के बाद भी यह दंड प्रभावी रखा गया। उनकी वैधानिक अपील भी खारिज कर दी गई।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उनकी 35 वर्षों की सेवा निष्कलंक रही है। वे केवल ऋण की अनुशंसा करने वाले अधिकारी थे, स्वीकृति देने वाले प्राधिकारी नहीं। कई ऋण बाद में नियमित भी हो गए और बैंक को वास्तविक वित्तीय हानि का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

उन्होंने कहा कि 21 चरणों की कटौती ने उनके रिटायरमेंट के बाद की आर्थिक सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव डाला। कुछ ऋण उनके प्रतिनियुक्ति काल से पूर्व के थे और संबंधित अभिलेख भी उपलब्ध नहीं कराए गए।

अदालत का निर्णय

अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता की ओर से कुछ त्रुटि से इनकार नहीं किया जा सकता परंतु प्रतिवादी यह सिद्ध नहीं कर सके कि उनकी अनुशंसा से बैंक को कोई प्रत्यक्ष और परिमाणित वित्तीय हानि हुई। यह भी ध्यान में रखा गया कि वे ऋण स्वीकृत करने वाले प्राधिकारी नहीं थे।

खंडपीठ ने कहा कि 21 चरणों की कटौती अत्यंत कठोर दंड है जिसका रिटायर कर्मचारी पर आजीवन वित्तीय प्रभाव पड़ता है।

हालांकि, अदालत ने पूरी अनुशासनात्मक कार्यवाही रद्द नहीं की लेकिन दंड में संशोधन करते हुए आदेश दिया कि वेतनमान में 21 चरणों की कटौती के स्थान पर 2 अप्रैल 2014 से पांच वर्ष की अवधि के लिए उनकी मासिक पेंशन से 5 प्रतिशत की कटौती की जाए।

अदालत ने दोहराया कि दंड ऐसा होना चाहिए, जो अपराध और अपराधी के अनुरूप हो और प्रत्येक मामले में परिस्थितियों, सेवा रिकॉर्ड तथा शमन या गंभीर कारकों का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक है।




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