वर्तमान शिक्षा व्यवस्था असभ्यता को पोषित कर रही है उस असभ्यता का एक ही कारण है, शिक्षक को रीढ़ विहीन कर दिया जाना, उसे सरकार और मैनेजमेंट द्वारा नौकर के रूप में डील करना

 वर्तमान शिक्षा व्यवस्था असभ्यता को पोषित कर रही है उस असभ्यता का एक ही कारण है, शिक्षक को रीढ़ विहीन कर दिया जाना, उसे सरकार और मैनेजमेंट द्वारा नौकर के रूप में डील करना। शिक्षकों को एयरपोर्ट, शौचालय और सांड़ गिनने में लगाकर, फैशन शो की तैयारी का जिम्मा देकर कोई भी समाज यदि सोचता है कि आने वाली पीढ़ी सुशिक्षित होगी तो यह उसका भ्रम है। 



हैप्पीनेस क्लास जैसे तमाम पाखंडपूर्ण कार्यक्रमों के चलते पढ़ाई को एकदम मनोरंजन का रूप दिया जा रहा है। निजी कॉलेज और विश्वविद्यालयों को होटल बनाया जा रहा है। इनसे कोई उम्मीद नही कि ये मर्यादा, अनुशासन वाले स्टूडेंट प्रोड्यूस करेंगे। 

हमें याद करने की जरूरत है कि जिस सरकारी शिक्षा ने आठवें दशक के अवसान तक गांवों-कस्बों से कनस्तर में उदरपूर्ति और कंधे पर बिस्तरबंद में ओढ़ने-बिछाने का सामान लेकर घर से निकले छात्रों में ही वैज्ञानिक, डाक्टर और इंजीनियर आर्थिक लाचारियों के बावजूद गढ़े थे, वहीं शिक्षा जब मात्र व्यापार के हवाले हो गयी तो  डाक्टर,इंजीनियर बनने के लिए प्रतिस्पर्धा योग्यता की बजाए, पच्चीस-पचास लाख रूपये धनराशि की अनिवार्य शर्त हो गई। 

राजनेताओं और नौकरशाहों ने भूमफियाओं शराब माफियाओं और चिट फण्ड कंपनियों के साथ मिलकर केंद्रीय विश्वविद्यालयऔर चिकित्सा, इंजीनियंरिंग व प्रबंधन के महाविद्यालय तक खोल उच्च शिक्षा को चौपट करने का काम कर दिया। क्या ऐसी मानसिकता वाले शिक्षा संचालक शिक्षा को सभ्यता से जोड़ने   का काम कर सकते हैं ?

उन्होंने तो पैसे से डिग्री बेचने के धंधे को  शिक्षा मान लिया है। यही मुख्य वजह है कि आज शत-प्रतिशत शिक्षा ज्ञानोन्मुखी होने की बजाए पैसे के लेन देन के केंद्र मात्र रह गए है, ज्ञान नहीं तो अर्थ कैसे मिलेगा। ज्ञान से अर्थ को उल्टा कर दिया गया। अर्थ है तो  ज्ञान की जरूरत नही, जो वास्तव में नवाचारी प्रतिभाए हैं, वे तो अर्थाभाव के चलते  शिक्षा से पूरी तरह वंचित ही हो गई ? ऐसे संस्थानों  से हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे सद आचरण में दीक्षित छात्र उत्पन्न करेंगे।

हम सब आज के जितने संसाधनों में नही पढ़े, हम सबने विद्यालय को साफ रखने, ब्लैक बोर्ड को दुरुस्त रखने, टाट बोरी घर से ले जाने और अध्यापक की मार दुलार प्राप्त करने वाली पीढ़ी से हैं तो क्या हमने ज्ञान नही प्राप्त किया, क्या आचरण की एक निश्चित व्यवस्था को नही प्राप्त किया! सभ्यता के पायदान पर बड़े छोटे का सम्मान अति महत्वपूर्ण होता है, क्या हमें यह नही सिखाया गया कि उचित अनुचित क्या होता है! सब सिखाया गया और स्कूल से हम अच्छे नागरिक बन कर निकले भी। 

शिक्षकों को क्लर्क, रीढ़विहीन लीचड़ नौकर बना कर कोई देश विश्व गुरु नहीं बन सकता।

( एक निजी विश्वविद्यालय में फ्रेशर पार्टी का चित्र यह बताता है कि विश्वविद्यालय फाइव स्टार होटल बनते जा रहे हैं, वहां शिक्षा की उम्मीद रखना शायद बेमानी होगी।)



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