एस. एम. कॉलेज, चंदौसी प्रकरण में गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा की गई सुनवाई को माननीय उच्च न्यायालय ने क्षेत्राधिकार के अंतर्गत माना

एस. एम. कॉलेज, चंदौसी प्रकरण में गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा की गई सुनवाई को  माननीय उच्च न्यायालय ने क्षेत्राधिकार के अंतर्गत माना 

एस. एम. कॉलेज, चंदौसी के प्रबंधतंत्र द्वारा बर्खास्त किए गए आयोग चयनित प्राचार्य प्रोफेसर डॉ. दानवीर सिंह यादव, आयोग चयनित प्राध्यापक प्रोफेसर/डॉ. प्रवीण कुमार तथा स्ववित्त पोषित योजना में कार्यरत प्राध्यापिका डॉ. गीता शर्मा की बर्खास्तगी एवं विश्वविद्यालय द्वारा जांच सुनवाईमें बहाली संबंधी प्रकरण पर सुनवाई करते हुए प्राचार्य एवं दोनों ही शिक्षकों को बड़ी राहत दी है।

प्रकरण में गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा की गई सुनवाई को माननीय उच्च न्यायालय ने क्षेत्राधिकार के अंतर्गत माना। प्रबंधतंत्र द्वारा प्राचार्य प्रोफेसर/डॉ. दानवीर सिंह यादव, प्रोफेसर/डॉ. प्रवीण कुमार एवं डॉ. गीता शर्मा के विरुद्ध पारित बर्खास्तगी का आदेश विधिवत रूप से अमान्य करार देने के मामले को भी सही ठहराया।



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महत्वपूर्ण बिंदु

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-वर्तमान में रोहिलखंड विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को अनुशासनात्मक कार्यवाही के संबंध में कोई आदेश पारित करने का अधिकार नहीं 

-कुलपति, रजिस्ट्रार के माध्यम से, गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद को याचिकाकर्ता के कॉलेज द्वारा अपने शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही के प्रस्तावों पर आदेश पारित करने का अधिकार

-बर्खास्तगी के आदेश से स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पर्याप्त रूप से और उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।  

-प्रबंधतंत्र द्वारा प्राचार्य प्रोफेसर/डॉ. दानवीर सिंह यादव, प्रोफेसर/डॉ. प्रवीण कुमार एवं डॉ. गीता शर्मा के विरुद्ध पारित बर्खास्तगी का आदेश विधिवत रूप से अमान्य 

-उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, लखनऊ के उपाध्यक्ष द्वारा पारित आदेश का अनुपालन करने के अलावा कोई कानूनी प्रभाव नहीं 

-गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार का यह निर्देश कि प्रबंधन समिति के विरुद्ध जांच लंबित रहने के दौरान छात्रों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों या शिक्षण कर्मचारियों के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए, न्यायालय के अनुसार दूरगामी प्रभाव वाला आदेश बताया 

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क्या था मामला 

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-महाविद्यालय के आयोग चयनित प्राचार्य एवं दो प्राध्यापकों को प्रबंधन तंत्र द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था। 

- प्रबंधतंत्र द्वारा प्राचार्य प्रोफेसर/डॉ. दानवीर सिंह यादव, प्रोफेसर/डॉ. प्रवीण कुमार एवं डॉ. गीता शर्मा को बर्खास्त किया था 

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विश्वविद्यालय का क्या था आदेश

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गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा की गई जांच सुनवाई संबंधी कार्यवाही के अंतर्गत विश्वविद्यालय के कुलसचिव द्वारा पत्र जारी कर प्रबंध समिति को यह  आदेश दिया था कि बर्खास्त किए गए प्राचार्य एवं प्राध्यापकों के आदेशों को विधि शून्य एवं निष्प्रभावी घोषित कर दिया गया था। विश्वविद्यालय द्वारा यह भी आदेश दिया गया था कि सुनवाई जारी रहने तक महाविद्यालय के किसी भी हितधारक के विरुद्ध कोई भी क्षयकारी निर्णय/आदेश प्रबंधन द्वारा जारी नहीं किए जाएंगे। इसके साथ ही प्राचार्य एवं  दोनों प्राध्यापकों को महाविद्यालय में अपने  कर्तव्यों का निर्वहन करने हेतु आदेशित किया गया था।

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पिछड़ा वर्ग आयोग की क्या थी संस्तुति 

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इस प्रकरण के सम्बन्ध में माननीय उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, लखनऊ द्वारा गहन, विस्तृत एवं लम्बी जांच प्रक्रिया के अंतर्गत दिनांक 04 दिसंबर, 2025 को निर्गत पत्र के माध्यम से अपनी संस्तुति में कहा था कि-

“सम्यक विचारोंपरान्त प्रमुख सचिव (उच्च शिक्षा) उत्तर प्रदेश शासन; शिक्षा निदेशक (उच्च शिक्षा) उत्तर प्रदेश, प्रयागराज; कुलपति-गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद; क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी, बरेली; जिलाधिकारी, जिला-संभल व पुलिस अधीक्षक, जिला-संभल को संस्तुति की जाती है की प्रबंधतंत्र/प्राचार्य/सचिव एस. एम. कॉलेज, चंदौसी, जिला-संभल की शैक्षणिक, प्रशासनिक, वित्तीय अनियमिताओं की शिकायतों के संदर्भ में विश्वविद्यालय में की जा रही सुनवाई में प्रबंध समिति के असहयोगात्मक, स्वेच्छाचारिता, मनमानी रवैया के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 की धारा-58 के अंतर्गत महाविद्यालय के शैक्षणिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय अनुशासन को बनाए रखने हेतु प्राधिकृत नियंत्रक नियुक्त करने व विधिक कार्यवाही करने तथा शिकायतकर्ता डॉ. प्रवीण कुमार, प्रोफेसर-वाणिज्य एस. एम. कॉलेज, चंदौसी, जिला-संभल की अनियमित रूप से की गई बर्खास्तगी व निलंबन को बहाल करते हुए, निलंबन की तिथि से नियमानुसार देय वेतन/धनराशि का तत्काल प्रभाव से नियमित रूप से भुगतान किया जाए ताकि शिकायतकर्ता के साथ नैसर्गिक न्याय हो सके। कृत कार्रवाई से 15 दिन के अंदर आयोग को अवगत कराया जाए।“

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प्रबंध समिति का पक्ष

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यह एस.एम. कॉलेज, चंदौसी की प्रबंधन समिति द्वारा उसके सचिव के माध्यम से दायर की गई तीन रिट याचिकाएं दायर की गई थी।  जिनके माध्यम से कहा गया था कि गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय मुरादाबाद को प्रकरण में कोई भी आदेश देने का अधिकार नहीं है। इसके साथ ही एक याचिका में पिछड़ा वर्ग आयोग, लखनऊ द्वारा दिए गए आदेश को भी प्रबंधतंत्र द्वारा क्षेत्राधिकार के बाहर बताया गया था। 

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रिट याचिका संख्या 6959/2025 दिनांक 17.4.2025 के एक आदेश के विरुद्ध दायर की गई है, जिसके द्वारा गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार ने उपर्युक्त कॉलेज की प्रबंधन समिति को निर्देश दिया है कि विश्वविद्यालय द्वारा उक्त कॉलेज के विरुद्ध दिनांक 13.4.2025 को नोटिस जारी कर शुरू की गई जांच के लंबित रहने के दौरान उपर्युक्त कॉलेज के किसी भी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी के विरुद्ध कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। साथ ही, गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार द्वारा दिनांक 30.4.2025 को पारित एक आदेश के विरुद्ध भी याचिका दायर की गई है, जिसके द्वारा प्रतिवादी संख्या 6 (प्रवीण कुमार), एक प्रोफेसर का निलंबन और बर्खास्तगी प्रावधानों के विपरीत होने के कारण प्रारंभ से ही अमान्य घोषित कर दी गई थी।

रिट याचिका संख्या 8568/2025 दिनांक 30.4.2025 के एक आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी, जिसके द्वारा गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार ने प्रतिवादी संख्या 6 (श्रीमती गीता शर्मा), जो एक सहायक प्रोफेसर हैं, की दिनांक 8.4.2025 की बर्खास्तगी के आदेश को प्रावधानों के विपरीत होने के कारण प्रारंभ से ही अमान्य घोषित कर दिया था।

तीसरी रिट याचिका संख्या 324/2026 दिनांक 25.8.2025 के एक आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी, जो प्रतिवादी संख्या 2 (उपाध्यक्ष, उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग) द्वारा प्रतिवादी संख्या 7 (डॉ. प्रवीण कुमार) की शिकायत पर पारित किया गया था, जिसके द्वारा प्रबंधन समिति को दिनांक 17.2.2025 के निलंबन और दिनांक 18.4.2025 की बर्खास्तगी के आदेश को वापस लेने और उन्हें कार्यभार ग्रहण करने की अनुमति देने तथा निलंबन की तिथि से वेतन का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

प्रबंधन समिति की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया कि गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार द्वारा दिनांक 30.4.2025 को महाविद्यालय के प्रधानाचार्य और दो व्याख्याताओं के मामले में पारित आदेश, जिसके द्वारा उनके संबंधित निलंबन और बर्खास्तगी के आदेशों को प्रारंभ से ही अमान्य घोषित किया गया था, अधिकार क्षेत्र के बिना पारित किए गए थे।

विद्वान वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया कि संबंधित कॉलेज प्रारंभ में एम.जे.पी. रोहिलखंड विश्वविद्यालय से संबद्ध था और प्रधानाचार्य तथा दो व्याख्याताओं के निलंबन और बर्खास्तगी के आदेश रोहिलखंड विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को भेजे गए थे, हालांकि उक्त रजिस्ट्रार द्वारा कोई आदेश पारित नहीं किया गया और गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद को भी कोई कागजात नहीं भेजे गए, जो उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) अधिनियम 2024 (जो 13.8.2024 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित हुआ) के माध्यम से अस्तित्व में आया, अर्थात् उक्त आदेशों के बाद। हालांकि, विश्वविद्यालय से संबद्ध होने वाले क्षेत्र और कॉलेजों के निर्धारण की आगे की प्रक्रिया, जो पहले रोहिलखंड विश्वविद्यालय से संबद्ध थे, हाल ही में अंतिम रूप दी गई है और उन्होंने 6.5.2025 को जारी अधिसूचना के साथ-साथ 23.5.2025 के पत्र का हवाला दिया और कहा कि विवादित आदेश इससे पहले पारित किए गए थे, इसलिए जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार द्वारा पारित ऐसे आदेश क्षेत्राधिकार से बाहर होने के कारण प्रारंभ से ही अमान्य हैं। याचिकाकर्ता प्रबंधन समिति द्वारा भेजे गए प्रस्तावों पर विचार करने के लिए उपयुक्त प्राधिकारी केवल रोहिलखंड विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार थे।

विद्वान वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया कि प्रधानाचार्य और अन्य दो व्याख्याताओं के खिलाफ दुर्व्यवहार के गंभीर आरोपों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए बर्खास्तगी के आदेश पारित किए गए हैं।

विद्वान वरिष्ठ वकील ने आगे प्रस्तुत किया कि उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष को याचिकाकर्ता द्वारा अपने शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के खिलाफ चलाई गई अनुशासनात्मक कार्यवाही के संबंध में कोई आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है और इसके लिए उन्होंने इस न्यायालय के एक निर्णय का हवाला दिया है, जो कि उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग और 5 अन्य (न्यूट्रल साइटेशन संख्या-2013:AHCLKO:16800) से संबंधित है।

अंत में, विद्वान वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया कि जंभेश्वर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को प्रबंधन समिति के विरुद्ध कोई भी जांच शुरू करने या किसी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी के विरुद्ध जांच के दौरान कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न करने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है, जो स्वयं कानून के विरुद्ध है।

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बचाव पक्ष की दलील 

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प्रतिवादियों के विद्वान अधिवक्ता ने  गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा 30 अप्रैल, 2025 को निर्गत आदेश जिसे प्रबंध तंत्र द्वारा विवादित आदेश बताया जा रहा है का समर्थन करते हुए कहा कि प्रबंधन समिति ने दुर्भावना से कार्य किया है। प्रबंधन तंत्र प्राचार्य और व्याख्याताओं को परेशान करने के आदी हैं। बचाव पक्ष के वकील में माननीय उच्च न्यायालय को यह है कि बताया कि प्रतिवादी व्याख्याता में से एक की पिटाई भी की गई थी और उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। कॉलेज के प्रोफेसर और लेक्चरर के विद्वान वकील ने प्रस्तुत किया है कि उनकी पीठ पीछे जांच की गई और संबंधित कॉलेज की प्रबंधन समिति ने बिना कोई कारण बताए एक प्रस्ताव पारित कर दिया तथा उक्त प्रतिवादियों में से किसी को भी दूसरा कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया। 

बचाव पक्ष के वकील ने दलील देते हुए कहा कि गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार को आदेश पारित करने का अधिकार है क्योंकि यह उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) अधिनियम, 2024 के माध्यम से लागू हुआ, जो 13.8.2024 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित और स्थापित हुआ, अर्थात् संबंधित प्रतिवादी के निलंबन और बर्खास्तगी के आदेश के पहले। इसके अलावा, याचिकाकर्ता का कॉलेज अब गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय से संबद्ध है।

प्रतिवादियों के विद्वान वकील ने आगे प्रस्तुत किया कि उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष ने शिकायतकर्ता प्रोफेसर के विरुद्ध कार्यवाही वापस लेने का निर्देश केवल इसलिए दिया क्योंकि उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया था कि उस आदेश से पहले गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने शिकायतकर्ता के विरुद्ध पारित प्रतिकूल आदेशों को पहले ही रद्द कर दिया था।

यह भी बताया गया कि वर्तमान में एक ही आदेश लागू है, इसलिए वर्तमान में रिट याचिकाकर्ताओं, अर्थात् प्रबंधन समिति, के पास वर्तमान रिट याचिकाओं को आगे बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है।

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माननीय उच्च न्यायालय ने क्या कहा?

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माननीय उच्च न्यायालय द्वारा प्रकरण का निपटारा करते हुए कि हमने दोनों पक्षों के विद्वान वकीलों की बात सुनी और अभिलेखों का अवलोकन किया। उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, लखनऊ के उपाध्यक्ष द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने के संबंध में, न्यायालय का मत है कि यह आदेश गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के आदेशों को ध्यान में रखते हुए पारित किया गया था, जिसके तहत प्रतिवादी संख्या 7 (शिकायतकर्ता) के निलंबन और बर्खास्तगी के आदेश को पहले ही शून्य घोषित कर दिया गया था, इसलिए इसका प्रभाव केवल उक्त आदेश का अनुपालन करना होगा।

माननीय न्यायालय द्वारा यह भी कहा कि चूंकि शिकायतकर्ता को पहले ही राहत दी जा चुकी है, इसलिए उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष द्वारा पारित आदेश का अनुपालन करने के अलावा कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। 

न्यायालय ने 2013:AHCLKO:16800 का भी संज्ञान लिया है। हालांकि, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष द्वारा पारित आदेश का कोई कानूनी प्रभाव नहीं है, क्योंकि जिसकी शिकायत पहले ही सुलझ चुकी है, उसके मामले में क्षेत्राधिकार के प्रश्न पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तदनुसार, रिट याचिका संख्या 324/2026 का निपटारा रिट याचिका संख्या 6959/2025 के परिणाम के अधीन किया जाता है, जिसमें गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार द्वारा शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 7) के संबंध में पारित आदेश को चुनौती दी गई है।

जहां तक ​​अन्य दो रिट याचिकाओं का संबंध है, प्रबंधन समिति की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस बात से इनकार नहीं किया है कि वर्तमान में गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के कुलपति को रजिस्ट्रार के माध्यम से उपर्युक्त तीनों प्रतिवादियों की बर्खास्तगी के प्रस्ताव पर विचार करने का अधिकार है।

यह निर्विवाद है कि उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) अधिनियम 2024 दिनांक 13.8.2024 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित हुआ था, इसलिए गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद उसी तिथि को अस्तित्व में आया, अतः इसके बाद, रोहिलखंड विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को अनुशासनात्मक कार्यवाही के संबंध में कोई आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।

परिसीमन का संबंध है, क्योंकि यह एक सतत प्रक्रिया है, इसलिए इसके लिए बाद में अधिसूचनाएँ और आदेश जारी किए गए, लेकिन याचिकाकर्ता का कॉलेज पहले से ही गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद से संबद्ध था।

इसके अलावा भी, आज की तारीख में निर्विवाद रूप से कुलपति, रजिस्ट्रार के माध्यम से, गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद को याचिकाकर्ता के कॉलेज द्वारा अपने शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही के प्रस्तावों पर आदेश पारित करने का अधिकार है।

माननीय न्यायालय द्वारा आगे कहा कि उपरोक्त पृष्ठभूमि में, मैंने जांच रिपोर्ट और प्रबंधन समिति के प्रस्ताव का भी अवलोकन किया है कि क्या उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं।

यह निर्विवाद है कि कोई दूसरा कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया था, अर्थात् कारण बताओ नोटिस के साथ जांच रिपोर्ट संबंधित दोषियों को कभी नहीं दी गई थी, जो बर्खास्तगी के आदेश से स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। अतः, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पर्याप्त रूप से पालन नहीं किया गया और तदनुसार उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसलिए, तीनों निजी प्रतिवादियों के विरुद्ध पारित बर्खास्तगी का आदेश विधिवत रूप से अमान्य है। तदनुसार, विवादित आदेशों में कोई अवैधता नहीं है, जिसके तहत ऐसे आदेशों को प्रारंभ से ही अमान्य माना जाए।

माननीय न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया कि न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा है कि आज एक ही आदेश लागू होता है। गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के रजिस्ट्रार का यह निर्देश कि प्रबंधन समिति के विरुद्ध जांच लंबित रहने के दौरान छात्रों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों या शिक्षण कर्मचारियों के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए, न्यायालय के अनुसार दूरगामी प्रभाव वाला आदेश है। 

अतः, यदि याचिकाकर्ताओं के सहयोग से प्रस्तावित जांच आज से तीन सप्ताह के भीतर पूरी नहीं होती है, तो उक्त आदेश का यह भाग कानून के अनुसार जांच के परिणाम के अधीन रहते हुए निष्क्रिय हो जाएगा। 

एस.एम. कॉलेज, चंदौसी की प्रबंधन समिति द्वारा उसके सचिव के माध्यम से उच्च न्यायालय में दायर की गई इन तीन रिट में याचिकाकर्ताओं की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री रितुवेंद्र सिंह नागवंशी,   अधिवक्ता श्री दीपक कुमार, विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रभाकर अवस्थी, श्री रोहित पांडे, शम्भावी तिवारी, तथा प्रतिवादियों की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री गिरीश कुमार यादव और गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के विद्वान अधिवक्ता श्री प्रशांत माथुर ने पक्ष रखा।

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