जेब में सिर्फ 20 रुपये और बिस्तर के नाम पर समंदर का किनारा

 🚩 जेब में सिर्फ 20 रुपये और बिस्तर के नाम पर समंदर का किनारा... 🚩

तमिलनाडु में ‘संघ’ के संघर्ष, संकल्प और विजय की अविश्वसनीय गाथा! 🔥



लोग आज 'तमिलनाडु मॉडल' की बात करते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि उस धरती पर राष्ट्रवाद का बीज बोने के लिए ऋषितुल्य प्रचारकों ने अपना खून-पसीना एक कर दिया है। यह कहानी उन वीरों की है जिन्होंने 'शून्य' से 'सृजन' किया।

1️⃣ शुरुआत: 20 रुपये और अटूट विश्वास

डॉ. हेडगेवार जी ने नागपुर से एक दुबले-पतले युवा दादाराव परमार्थ को तमिलनाडु भेजा।

🔹 जेब में खर्च के नाम पर सिर्फ 20 रुपये थे।

🔹 भाषा नहीं आती थी, रहने का ठिकाना नहीं था।

🔹 वो समंदर किनारे रेत पर सोते थे और मंदिरों में भोजन करते थे।

कई महीनों के संघर्ष के बाद, चेन्नई में पहली शाखा लगी। उन्होंने अपना पूरा जीवन, यहाँ तक कि अपनी अंतिम सांस भी तमिलनाडु को दे दी।

2️⃣ वो गोल्ड मेडलिस्ट, जिसने ठुकरा दिया करियर

जब दूसरे प्रचारक शिवराम जोगलेकर (M.Sc Gold Medalist) को गुरुजी ने तमिलनाडु जाने को कहा, तो उन्होंने एक पल नहीं सोचा।

🔹 एक तरफ शानदार करियर था, दूसरी तरफ अनजान प्रदेश में संघर्ष।

🔹 गुरुजी ने पूछा- "रोटी पसंद है या चावल?" शिवराम जी बोले- "मैं प्रचारक हूँ, जो मिलेगा खा लूँगा।"

🔹 उन्होंने मजदूरों की बस्तियों में काम किया, पैदल घूमे और सेवा के माध्यम से स्वयंसेवक तैयार किए। 45 साल की तपस्या के बाद अपनी देह भी तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेज को दान कर गए।

3️⃣ विरोध के बीच खिलता कमल

आज जहाँ 60,000 महिलाएं 'कर्मा योगिनी समागम' में हिस्सा ले रही हैं, जहाँ शाखाओं की संख्या 3000 के पार जा रही है, यह उन प्रचारकों के त्याग का परिणाम है।

आज का युवा जानता है कि:

✅ तमिलनाडु में 108 में से 84 वैष्णव दिव्यदेशम हैं।

✅ 276 पवित्र शिव मंदिर और चोल राजाओं की भक्ति इसी धरती की पहचान है।

✅ सनातन और तमिल संस्कृति अलग नहीं, एक ही हैं!

संघ का विरोध करने वाले 'तमिलनाडु मॉडल' की बात करते हैं, लेकिन संघ ने वहां 'त्याग और तपस्या' का मॉडल खड़ा कर दिया है। यह जीत उस जिजीविषा की है जो कभी हार नहीं मानती।

नमन है ऐसे तपस्वी प्रचारकों को! 🙏🚩

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