जब योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता ने अटल बिहारी वाजपेयी को भी क्षणभर के लिए विस्मित कर दिया…
जब योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता ने अटल बिहारी वाजपेयी को भी क्षणभर के लिए विस्मित कर दिया…
वो दृश्य आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास में एक अद्भुत अध्याय की तरह दर्ज है।
स्थान था महाराजगंज, समय था जब भारतीय राजनीति अनुभव और युवा ऊर्जा के बीच सेतु खोज रही थी।
भारत रत्न, युगपुरुष, श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी चुनावी सभा को संबोधित करने पहुँचे थे।
चारों ओर जनसैलाब था — दूर-दराज़ के गाँवों से आए कार्यकर्ता, साधारण किसान, युवा, माताएँ, बुज़ुर्ग…
सब एक ही उद्देश्य से आए थे — अपने नेताओं को सुनने।
सभा सामान्य ढंग से आगे बढ़ रही थी…
लेकिन तभी मंच से एक युवा साधु ने माइक संभाला —
नाम था योगी आदित्यनाथ।
जैसे ही योगी आदित्यनाथ ने बोलना शुरू किया,
महाराजगंज की धरती पर कुछ ऐसा घटा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
पूरा माहौल अचानक बदल गया।
हवा में एक अलग ही ऊर्जा तैरने लगी।
चारों दिशाओं से एक ही गूँज उठी—
“योगी! योगी! योगी!”
नारे इतने प्रबल, इतने स्वतःस्फूर्त और इतने भावनात्मक थे
कि मंच पर बैठे कई वरिष्ठ नेता एक-दूसरे की ओर देखकर आश्चर्य से भर उठे।
यह कोई योजनाबद्ध नारा नहीं था,
यह जनता के दिल से निकली पुकार थी।
और उसी मंच पर बैठे थे
राजनीति के शिखर पुरुष — अटल बिहारी वाजपेयी।
जनता का यह अपार उत्साह,
एक पहली बार के युवा सांसद के लिए यह दीवानगी,
यह दृश्य देखकर
वाजपेयी जी भी क्षणभर के लिए दंग रह गए।
1998 — जब इतिहास ने भविष्य की आहट सुन ली
साल 1998,
योगी आदित्यनाथ पहली बार संसद पहुँचे थे।
न कोई लंबा राजनीतिक वंश,
न कोई वर्षों की सत्ता की पृष्ठभूमि —
फिर भी जनता का ऐसा अटूट विश्वास!
किसी ने नहीं सोचा था कि
एक युवा साधु,
इतने कम समय में
पूर्वांचल की आत्मा से इस तरह जुड़ जाएगा।
लेकिन महाराजगंज की उस सभा ने साफ़ संकेत दे दिया था—
यह केवल एक सांसद नहीं,
यह भविष्य का नेतृत्व है।
जब अटल जी ने स्वयं स्वीकार किया जनभावना का सच
योगी आदित्यनाथ के भाषण के बाद
जब अटल बिहारी वाजपेयी मंच पर आए,
तो उन्होंने भी जनता की नब्ज़ को पहचान लिया था।
और तभी वाजपेयी जी के मुख से निकले वे शब्द
जो आज भी याद किए जाते हैं—
“पूर्वांचल में रहना है,
तो योगी-योगी कहना है।”
यह कोई साधारण नारा नहीं था।
यह एक अनुभवी राजनेता द्वारा
उभरते नेतृत्व की मौन स्वीकृति थी।
उस क्षण
सभा केवल चुनावी मंच नहीं रही,
वह इतिहास का साक्षी बन गई।
समय ने साबित किया — जनभावना कभी झूठी नहीं होती
इसके बाद के चुनावों में
योगी आदित्यनाथ ने
और भी बड़े अंतर से जीत दर्ज की।
महाराजगंज की जनता ने यह साबित कर दिया कि
वे केवल नारे नहीं लगाते,
वे अपने विश्वास को वोट में बदलना भी जानते हैं।
आज जब योगी आदित्यनाथ
एक सशक्त, निर्णायक और लोकप्रिय नेतृत्व के रूप में जाने जाते हैं,
तो महाराजगंज की वह सभा
एक प्रारंभिक संकेत की तरह याद आती है।
इतिहास जब भविष्य को पहचान ले…
कभी-कभी इतिहास ऐसे क्षण रचता है
जहाँ
अनुभव,
युवा ऊर्जा,
और जनता की भावना
एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं।
महाराजगंज की वह सभा
ठीक वैसा ही क्षण थी।
और शायद इसी को कहते हैं—
जब जनता पहले पहचान लेती है,
और इतिहास बाद में उस पर मुहर लगाता है।

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