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रात में सोती है दिन में सोती है बताओ क्या?

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  रात में सोती है दिन में सोती है बताओ क्या? (हिंदी में पहेलियां) पहेलियां हमारे दिमाग को चुनौती देने और सोचने की क्षमता को बढ़ाने का एक मजेदार तरीका हैं। ये केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि हमारी तर्क शक्ति और बुद्धि को भी तेज करती हैं। आज की पहेली बहुत ही दिलचस्प है जिसमें एक ऐसी चीज के बारे में पूछा गया है जो रात में भी सोती है और दिन में भी सोती है। इस लेख में हम आपके लिए 10 रोचक और दिमाग को चकराने वाली पहेलियां लेकर आए हैं जो आपके ज्ञान को परखेंगी। ये पहेलियां बिल्कुल आसान भाषा में हैं और आपको सोचने पर मजबूर कर देंगी। तो चलिए देखते हैं कि आप इनमें से कितनी पहेलियों का सही जवाब दे पाते हैं। प्रश्न 1. एक ऐसा फल बताओ जिसका नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है? Answer:  आम। यह भारतीय फलों से जुड़ी मजेदार पहेली है। आम को फलों का राजा कहा जाता है और इसका नाम सुनते ही इसकी मीठी खुशबू और स्वाद याद आ जाता है जिससे मुंह में पानी आ जाता है। प्रश्न 2. वो क्या है जो पानी में रहता है पर पानी से नहीं निकलता? Answer:  मछली। यह जलीय जीवों से संबंधित पहेली है। मछली पानी में रहती है और प...

केरल में संघ स्वयंसेवकों का सबसे ज्यादा खून बहा, जानिए RSS की 'द केरला स्टोरी'

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 केरल में संघ स्वयंसेवकों का सबसे ज्यादा खून बहा, जानिए RSS की 'द केरला स्टोरी' म्यांमार में जन्मे भास्कर राव कलंबी वो शख्स थे जिन्हें केरल में संघ की शाखाओं के विस्तार का श्रेय जाता है. शुरूआत में उन्होंने केरल की निर्धन मछुआरों की बस्तियों में रात्रि शाखाएं लगाने से की. उनमें लगातार बढ़ती संख्या को देखकर कम्युनिस्ट परेशान होने लगे और फिर शाखाओं पर हमला होने लगा। एक बार जब गुरु गोलवलकर केरल की यात्रा पर थे, कुछ किशोर स्वयंसेवकों ने उनकी उपस्थिति में एक खेल खेला. बाद में  उन्होंने एक स्वयंसेवक से पूछा, ‘इस खेल का नाम क्या है?’ लड़के ने जवाब दिया, 'दीपक बुझाना'. इस पर गुरु गोलवलकर ने एक बड़े स्वयंसेवक से पूछा, ‘क्या लड़के ने सही नाम बताया?’ जब उसने हां में उत्तर दिया, तो गुरु गोलवलकर ने कहा,  '’किसी भी खेल का नाम ऐसा नहीं होना चाहिए. हमारी संस्कृति में दीपक बुझाना अशुभ माना जाता है. यहां हम कहते हैं कि ज्ञान का दीपक चमकता रहे. खेलों में भी नाम ऐसे होने चाहिए जो अच्छे संस्कार पैदा करें,’’ बेझिझक कहा जा सकता है कि अगले ही दिन खेल का नाम बदलकर 'चैलेंज या चुनौती'...

सम्राट व्यक्तित्व वाले माननीय डॉ इन्द्रेश कुमार जी

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 सम्राट व्यक्तित्व वाले माननीय डॉ इन्द्रेश कुमार जी के पुज्नीय पिता जी उस जमाने में जनसंघ से विधायक थे और परिवार हरियाणा के कैथल शहर के सबसे धनाढ्य परिवारों में एक था। उसी परिवार से 10 साल की छोटी उम्र का एक बच्चा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाना शुरू करता है। संघ शाखा में जाने के साथ-साथ पढाई में भी अव्वल ये बालक इंजिनीयरिंग करने गया तो वहां भी अपनी योग्यता के झंडे गाड़ दिए और जब वहां से निकला तो मैकेनिकल इंजिनियरिंग में अपने बैच का गोल्ड मेडलिस्ट था। डिग्री मिलने के बाद अब मैकेनिकल इंजिनियरिंग के इस टॉपर विधार्थी के सामने दो रास्ते थे परिवार का जमा-जमाया व्यवसाय संभाले या फिर कहीं अच्छी सी नौकरी करे और उसके बाद गृहस्थी बसाये पर उसने ये रास्ता नहीं चुना उसने खुद को देश और धर्म की सेवा में झोंक दिया और 1970 में संघ के प्रचारक बन गये पिता ने खुशी में पूरे मोहल्ले में भोज किया कि उनके बेटे ने खुद के लिये जीने की बजाये देश के लिये जीने की राह चुनी है। प्रचारक बने तो संघ ने दिल्ली में काम करने का दायित्व सौंपा तो 1970 से 1983 तक अलग-अलग दायित्वों में दिल्ली में काम करते रहे. अपन...

क्या प्राचीन भारत में सच में छुआछूत और जातिगत शोषण था? या फिर यह झूठ हमें बार-बार पढ़ाया गया?

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 🚩 क्या प्राचीन भारत में सच में छुआछूत और जातिगत शोषण था? या फिर यह झूठ हमें बार-बार पढ़ाया गया? चलिए, हज़ारों साल पुराने इतिहास से खुद जवाब ढूंढते हैं 👇 📜 वैदिक और प्राचीन भारत 🔹 सम्राट शांतनु ने मछुआरे की पुत्री सत्यवती से विवाह किया। उनके पुत्र के लिए भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली — क्या यह शोषण था या त्याग? 🔹 महाभारत के रचयिता वेदव्यास मछुआरे कुल से थे, फिर भी महर्षि बने, गुरुकुल चलाया। 🔹 विदुर, दासी पुत्र होकर भी हस्तिनापुर के महामंत्री बने — विदुर नीति आज भी राजनीति का महाग्रंथ है। 🔹 भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया। 🔹 श्रीकृष्ण ग्वाल परिवार में जन्मे, 🔹 बलराम हल धारण करने वाले कृषक थे। फिर भी श्रीकृष्ण पूरे विश्व के पूजनीय बने और गीता दी। 🔹 राम के मित्र निषादराज उनके साथ गुरुकुल में पढ़े। 🔹 लव-कुश ने शिक्षा पाई वनवासी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में। 👉 साफ़ है — 📌 शिक्षा, सम्मान और पद योग्यता से मिलते थे, जन्म से नहीं। 📌 वर्ण काम के आधार पर थे — आज की भाषा में Division of Labour। 🏹 जनपद और साम्राज्य काल 🔹 नन्द वंश (मगध) — नाई कुल से उठकर सम्राट ब...

विभाजन से 1984 दंगों तक संघ का जोर सिखों से मजबूत रिश्तों पर रहा

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 विभाजन से 1984 दंगों तक संघ का जोर सिखों से मजबूत रिश्तों पर रहा देश के विभाजन के पूर्व अमृतसर में हिंसा हो रही थी. दंगाई सिखों को निशाना बना रहे थे. ऐसे नाजुक मौके पर स्वयंसेवकों ने पंजाब में गुरुद्वारों और सिखों की रक्षा की. इसके लिए दंगाइयों से कई जगहों पर उनका टकराव हुआ. बात 1947 की है, आजादी की खुशी विभाजन के दर्द के चलते ज्यादा देर नहीं टिक पाई थी. देश के दो टुकड़े हो चुके थे और दोनों ही जल रहे थे. सबसे ज्यादा मुश्किल पंजाब में थी, हिंदू और सिख महिलाओं का अपहरण हो रहा था. तब तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह ने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखा था. पत्र के मुताबिक जिस समय ये मुद्दा उठाया गया था उस समय तक पश्चिम पंजाब से 20 हजार महिलाओं और लड़कियों का अपहरण हो चुका था, जिनमें सिख और हिंदू दोनों समुदायों की महिलाएं शामिल थीं. उस वक्त संघ बड़े पैमाने पर राहत कार्य चला रहा था, शऱणार्थियों के लिए सैकड़ों शिविर बनाए गए थे, वहीं दंगाइयों व मुस्लिम लीग के गुंडों से भी लोहा ले रहा था. इस पत्र की एक प्रति  श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी भेजी गई थी. इसमें लिखा था कि ...

RSS के सबसे ज्यादा संगठन खड़े करने वाले ठेंगडी जिन्होंने ठुकरा दिया था पद्मभूषण

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 RSS के सबसे ज्यादा संगठन खड़े करने वाले ठेंगडी जिन्होंने ठुकरा दिया था पद्मभूषण मजदूरों के लिए काम कर रहे दत्तोपंत ठेंगडी को गुरु गोलवलकर का एक संदेश आया- आप फौरन लखनऊ से राज्यसभा के लिए नामांकन कर दीजिए. ठेंगड़ी इस संदेश का मैसेज उस समय नहीं समझ पाए, लेकिन जब इंदिरा ने इमरजेंसी लगाई तो इसका अर्थ समझ आ गया. ये मार्च 1964 का वक्त था. भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी को जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय के जरिए गुरु गोलवलकर का संदेश मिला कि आप फौरन लखनऊ से राज्यसभा का नामांकन कर दीजिए. देश और संघ के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का प्रण लेने वाले ब्रह्मचारी प्रचारक दत्तोपंत हैरान थे. उनके संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) को ना तो कोई राजनीति से लेना देना था और ना ही उनकी कोई इच्छा थी. लेकिन चूंकि संघ प्रमुख का संदेश था, सो उसे ना मानने का तो सवाल ही नहीं था. उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल कर दिया और वो राज्यसभा सांसद बन भी गए. उस वक्त गुरु गोलवलकर से पूछा भी था कि राज्यसभा क्यों भेज रहे हैं? तो उनका हंसते हुए जवाब था कि “जाओ, भाषण दो, विश्राम करो, बहुत परिश्रम कर लिया”. लेकिन वह गुरु ग...

जेब में सिर्फ 20 रुपये और बिस्तर के नाम पर समंदर का किनारा

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 🚩 जेब में सिर्फ 20 रुपये और बिस्तर के नाम पर समंदर का किनारा... 🚩 तमिलनाडु में ‘संघ’ के संघर्ष, संकल्प और विजय की अविश्वसनीय गाथा! 🔥 लोग आज 'तमिलनाडु मॉडल' की बात करते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि उस धरती पर राष्ट्रवाद का बीज बोने के लिए ऋषितुल्य प्रचारकों ने अपना खून-पसीना एक कर दिया है। यह कहानी उन वीरों की है जिन्होंने 'शून्य' से 'सृजन' किया। 1️⃣ शुरुआत: 20 रुपये और अटूट विश्वास डॉ. हेडगेवार जी ने नागपुर से एक दुबले-पतले युवा दादाराव परमार्थ को तमिलनाडु भेजा। 🔹 जेब में खर्च के नाम पर सिर्फ 20 रुपये थे। 🔹 भाषा नहीं आती थी, रहने का ठिकाना नहीं था। 🔹 वो समंदर किनारे रेत पर सोते थे और मंदिरों में भोजन करते थे। कई महीनों के संघर्ष के बाद, चेन्नई में पहली शाखा लगी। उन्होंने अपना पूरा जीवन, यहाँ तक कि अपनी अंतिम सांस भी तमिलनाडु को दे दी। 2️⃣ वो गोल्ड मेडलिस्ट, जिसने ठुकरा दिया करियर जब दूसरे प्रचारक शिवराम जोगलेकर (M.Sc Gold Medalist) को गुरुजी ने तमिलनाडु जाने को कहा, तो उन्होंने एक पल नहीं सोचा। 🔹 एक तरफ शानदार करियर था, दूसरी तरफ अनजान प्रदेश में संघर्ष...

यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026" (UGC Promotion of Equity Regulations, 2026) को लेकर चर्चा गर्म

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अभी भारत में "यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026" (UGC Promotion of Equity Regulations, 2026) को लेकर चर्चा गर्म है। जनरल (General) और ओबीसी (OBC) विवाद में जिस "कमेटी" का बार-बार जिक्र हो रहा है, वह 'इक्विटी कमेटी' (Equity Committee) है, जिसे अब हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। विवाद का मुख्य कारण इस कमेटी की संरचना (Composition) है। सोशल मीडिया और जनरल कैटेगरी के कुछ समूहों का आरोप है कि इस कमेटी में आरक्षित वर्गों (SC/ST/OBC) के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य किया गया है, लेकिन 'जनरल' कैटेगरी के लिए ऐसी कोई स्पष्ट अनिवार्यता नहीं लिखी गई है, जिससे उन्हें लगता है कि उनकी सुनवाई निष्पक्ष नहीं होगी। यहाँ उस कमेटी की सूची और विवरण दिया गया है: 1. इक्विटी कमेटी (Equity Committee) - जिस पर विवाद है यूजीसी के नए 2026 के नियमों के अनुसार, हर कॉलेज/यूनिवर्सिटी को भेदभाव की शिकायतों (जाति, धर्म, लिंग आदि) को सुनने के लिए एक कमेटी बनानी होगी। इसमें निम्नलिखित लोग अनिवार्य रूप से शामिल होने चाहिए:  * अध्यक्...

संघमय उड़ीसा के मंत्रदाता बाबूराव पालधीकर

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 21 जनवरी/जन्म-तिथि संघमय उड़ीसा के मंत्रदाता बाबूराव पालधीकर आज संघ का काम भारत के हर जिले और तहसील में है। इसकी नींव में वे लोग हैं, जिन्होंने विरोध और अभावों में संघ कार्य की फसल उगाई। उड़ीसा में संघ कार्य के सूत्रधार थे श्री दत्तात्रेय भीकाजी (बाबूराव) पालधीकर। बाबूराव का जन्म 21 जनवरी, 1921 में ग्राम बेढ़ोेना (वर्धा, महाराष्ट्र) में हुआ था। उनके पिताजी और चाचा जी भी स्वयंसेवक थे, इसलिए वे बालपन में ही डा0 हेडगेवार के सम्पर्क में आ गयेे। दत्तोपंत ठेंगड़ी आर्वी में इनके सहपाठी थे और इन्होंने ही उन्हें स्वयंसेवक बनाया था। मेधावी छात्र होने के साथ ही इनकी साहित्यिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में भरपूर रुचि थी।  1940 में बाबूराव ने तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण पूरा किया। उसी वर्ष नागपुर से बी.ए. कर वे प्रचारक बने और उन्हें फिरोजपुर (पंजाब) में जिला प्रचारक बनाकर भेजा गया। बाबूराव को मराठी, संस्कृत तथा अंग्रेजी आती थीं; पर एक वर्ष में ही उन्होंने हिन्दी, उर्दू तथा पंजाबी भी सीख ली। 1944 में वे विभाग प्रचारक तथा 1947 में सहप्रांत प्रचारक बने। विभाजन के समय हिन्दुओं की रक्षा तथा उन्हें...

IAS सूर्य पाल गंगवार — संक्षिप्त परिचय

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 🚨🚨आज बात करते हैं वर्तमान में #उत्तर_प्रदेश_मुख्यमंत्री कार्यालय में #सचिव के पद पर तैनात सरकार के सबसे विश्वसनीय अधिकारियों में से एक, सामाजिक चिंतक एवं तेजतर्रार #IAS_अधिकारी #श्री_सूर्यपाल_गंगवार जी के बारे में।🚨🚨  ✍️ IAS सूर्य पाल गंगवार — संक्षिप्त परिचय सूर्य पाल गंगवार एक वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी हैं। वे 2009 बैच, उत्तर प्रदेश कैडर से हैं और उत्तर प्रदेश के प्रमुख प्रशासनिक पदों पर कार्य कर चुके हैं, जिनमें लखनऊ के जिलाधिकारी (DM) और बाद में मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिव का पद शामिल है।  ✍️🧑‍🎓 प्रारंभिक जीवन और शिक्षा 👉सूर्य पाल गंगवार का जन्म 5 अगस्त 1977 को भारत के उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के बिथरी गाँव में हुआ था।  👉उनके पिता शिक्षक थे, जिससे उन्हें बचपन से अनुशासन और शिक्षा का महत्व समझ में आया।  👉उन्होंने प्राथमिक शिक्षा नवाबगंज के एक प्राइवेट स्कूल में पूरी की और बाद में नवोदय विद्यालय, बरेली से 6वीं से 12वीं तक की पढ़ाई की।  👉12वीं के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग में अध्ययन का निर्णय लिया और IIT रुड़की से B.E. (ऑनर्स...

बालासाहब ना होते तो दशकों पहले ही गुमनामी में चले जाते गोविंदाचार्य

 बालासाहब ना होते तो दशकों पहले ही गुमनामी में चले जाते गोविंदाचार्य गोविंदाचर्य बीजेपी और संघ के ऐसे नेता रहे जिनका दोनों संगठनों में प्रभाव रहा. कहानी ऐसी है कि बालासाहब देवरस सरसंघचालक न होते तो बिहार आंदोलन में अपनी सक्रियता के लिए के.एन. गोविंदाचार्य दंडित किए जाते. इसकी वजह थी उनका जोश जोश में अपना दायित्व भूलकर सीमा रेखा को पार कर जाना. बालासाहब देवरस ने जब तीसरे सरसंघचालक के तौर पर RSS की कमान संभाली थी, तब कुछ संकेत उन्होंने ऐसे दिए थे, जिससे स्पष्ट होता है कि उनके मन में संघ का वैचारिक विस्तार करने की प्रबल इच्छा थी. सरसंघचालक पद का दायित्व संभालने से पहले बालासाहब का महात्मा फुले की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने जाना भी उन्हीं में से एक था. संघ हमेशा से ही जातिगत भेदभाव के विरुद्ध था. खुद महात्मा गांधी ने उनके शिविर में घूमने के बाद ये उल्लेख किया था कि सभी जातियों के लोग संघ के वर्ग में बिना किसी भेदभाव के साथ रह रहे थे, खाना खा रहे थे. कभी गांधीजी ही 1901 के कांग्रेस अधिवेशन में अलग अलग जातियों की रसोई का जिक्र कर चुके थे. उनके लिए ये अनोखा था, बावजूद इसके बालासाहब ने स...