'पूरी तरह से गलत': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल जजों द्वारा आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखने की प्रथा की निंदा की
'पूरी तरह से गलत': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल जजों द्वारा आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखने की प्रथा की निंदा की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते ट्रायल कोर्ट के जजों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले का हवाला देते समय अपने आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखने की प्रथा की निंदा की।
कोर्ट ने इस सिस्टम को "पूरी तरह से गलत" बताया और कहा कि इसकी सराहना नहीं की जा सकती। इसने न्यायिक अधिकारियों को याद दिलाया कि उनके आदेशों में केवल हवाला, केस नंबर और संबंधित टेक्स्ट ही उद्धृत किया जाना चाहिए।
जस्टिस समित गोपाल की बेंच ने अपने आदेश में कहा,
"यह याद दिलाया जाता है कि फैसले का हवाला देते समय केवल उसका हवाला और/या केस नंबर और पार्टी का नाम और/या फैसले की तारीख के साथ-साथ जिस टेक्स्ट पर भरोसा किया गया है, उसे ही फैसले में उद्धृत और उल्लेख किया जाना चाहिए, जबकि उक्त पेज पर रिवीजनल कोर्ट ने बेंच बनाने वाले माननीय जजों के नाम का उल्लेख किया।"
कोर्ट ने इस तरह प्रियांका कुमार द्वारा अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका खारिज की, जिसने सरकारी नौकरी दिलाने के बहाने पैसे ठगने के आरोप में अपने रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की मांग की थी।
मामले के रिकॉर्ड की जांच करते समय हाईकोर्ट ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर विचार करते समय मेरठ के एडिशनल सेशन जज (रिवीजनल कोर्ट) ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के उन जजों के नाम का उल्लेख किया, जिन्होंने मामले का फैसला किया (जिसका हवाला दिया जा रहा था)।
जस्टिस गोपाल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि इस सिस्टम की "सराहना नहीं की जा सकती"।
उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट को जनवरी, 2025 में भी इसी तरह का मामला सामने आया, जब ट्रायल जजों को अपने आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम का उल्लेख न करने की चेतावनी देते हुए निर्देश जारी किए गए।
बेंच ने कहा कि उस आदेश के अनुपालन में रजिस्ट्रार जनरल ने सभी जिला और सेशन जजों/ओएसडी, सभी प्रिंसिपल जजों, फैमिली कोर्ट और कॉमर्शियल कोर्ट, एमएसीटी और एलएआरआर के सभी पीठासीन अधिकारियों को निर्देश जारी किए।
हालांकि, सिंगल जज ने टिप्पणी की कि संबंधित पीठासीन अधिकारी हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए पिछले निर्देशों से "पूरी तरह अनजान" थे।
कोर्ट ने आगे कहा,
"उक्त पीठासीन अधिकारी को इसकी याद दिलाई जाती है और उनसे कहा जाता है कि वे इस मामले को देखें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में उनसे यह गलती दोबारा न हो।"
कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को आदेश दिया कि वे संबंधित अधिकारी को यह आदेश बताएं ताकि वे "भविष्य में सावधान रहें"।
मामले के बारे में
याचिकाकर्ता (प्रियंक कुमार) ने एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट और एडिशनल सेशंस जज, मेरठ के आदेशों को चुनौती दी, जिन्होंने CrPC की धारा 203 के तहत उनकी शिकायत खारिज की थी।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी उसके रिश्तेदार हैं। उसने उसके भाई को एक मेडिकल कॉलेज में क्लर्क की नौकरी दिलाने के लिए उससे पैसे लिए थे।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसने एक डॉक्टर के बैंक खाते में 50,000 रुपये ट्रांसफर किए और बाद में 4 लाख रुपये नकद दिए। जब नौकरी नहीं मिली और पैसे वापस नहीं किए गए तो उसने CrPC की धारा 156(3) के तहत एक आवेदन दिया।
याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा बताए गए लेनदेन असल में अवैध समझौता था।
कोर्ट ने कहा,
"यह स्पष्ट है कि इस मामले में आरोप शिकायतकर्ता द्वारा आरोपी को पैसे देने के हैं, जो अवैध है, उक्त समझौता सार्वजनिक नीति के खिलाफ है।"
इस प्रकार, बेंच ने रिवीजनल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।
अपने आदेश में कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री के भीतर प्रशासनिक कमियों पर भी आपत्ति जताई। बेंच ने कहा कि याचिका के साथ हाथ से लिखे नोट्स वाले दस्तावेज दायर किए गए, फिर भी स्टाम्प रिपोर्टर ने आपत्ति नहीं की।
इस पर रिव्यू ऑफिसर ने बिना शर्त माफी मांगी। हालांकि, माफी को सिर्फ एक औपचारिकता के रूप में स्वीकार करने से इनकार करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अदालतों के सामने दस्तावेजों की साफ-सुथरी प्रतियां पेश करने की उम्मीद की जाती है। सिर्फ जवाब देना काफी नहीं है।"
सिंगल जज ने रजिस्ट्रार (आपराधिक) को अधिकारी को भविष्य में लगन से काम करने की चेतावनी जारी करने का निर्देश दिया। यह मामला 18 फरवरी को चैंबर्स में आगे के आदेशों के लिए सूचीबद्ध है।
Case Title: Priyank Kumar Vs. State Of U.P. And 6 Others 2026 LiveLaw (AB) 63


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें