सरकार और व्यवस्था ऐसे गुमनाम योद्धाओं को सिर्फ़ “कॉन्ट्रैक्ट वर्कर” न माने, बल्कि उन्हें सम्मान, सुरक्षा, बीमा और बेहतर भविष्य दे।
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*इस वर्णन को दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर स्तर पर काम करने वाले एक युवा टूरिस्ट, जो अपने परिवार के साथ एक सप्ताह की छुट्टियाँ बिताने लद्दाख पहुँचा था, प्रेषित किया है.....*
*ऊँचे पहाड़, बर्फ़ से ढकी चोटियाँ और ख़ामोशी सब कुछ जैसे किसी और ही दुनिया का एहसास करा रहा था। उनकी यात्रा के लिए जो स्थानीय ड्राइवर मिला, वह करीब अट्ठाईस वर्ष का लद्दाखी युवक था। शांत चेहरा, सधी हुई आवाज़ और आँखों में पहाड़ों जैसी गहराई। उसके घर परिवार में उसके बूढ़े माता–पिता, पत्नी और दो छोटी बेटियाँ थीं।*
*हिमालय के भीतर, संकरी और बर्फ़ीली सड़कों पर आगे बढ़ते हुए बातचीत शुरू हुई.....*
*टूरिस्ट ने सहज उत्सुकता से पूछा—*
*“जैसे ही यह हफ्ता ख़त्म होगा, यहाँ टूरिस्ट सीज़न भी ख़त्म हो जाएगा। फिर आप क्या करेंगे ? क्या आप भी बाकी लोगों की तरह किसी बड़े शहर- गोवा, दिल्ली या कहीं और होटल में काम करने चले जाते हैं ?”*
*लद्दाखी युवक ने बिना किसी शिकवे के उत्तर दिया.....*
*“नहीं साहब, मैं यहीं रहता हूँ। सर्दियों में भी। मैं लद्दाख छोड़कर कहीं नहीं जाता।”*
*टूरिस्ट को हैरानी हुई,*
*“लेकिन यहाँ तो सर्दियों में जान जमा देने वाली ठंड पड़ती है। तब आप करते क्या हैं ?”*
*युवक मुस्कराया-*
*“ज़्यादा कुछ नहीं। घर पर रहता हूँ। हाँ…एक काम ज़रूर करता हूँ। मैं सियाचिन चला जाता हूँ।” यह सुनते ही टूरिस्ट चौंक पड़ा.....*
*“सियाचिन...? वहाँ तो यहाँ से भी ज़्यादा ठंड है! वहाँ क्या काम ?”*
*युवक ने शांत स्वर में कहा-*
*“मैं वहाँ इंडियन आर्मी के लिए लोडर का काम करता हूँ।”*
*टूरिस्ट की उत्सुकता अब गहरी हो चुकी थी...*
*“मतलब आप सेना में भर्ती होते हैं ?”*
*“नहीं साहब,” उसने सिर हिलाया,*
*“मेरी उम्र अब भर्ती की नहीं रही। यह कॉन्ट्रैक्ट का काम है। मैं और मेरे जैसे कुछ और लोग जाते हैं। यहाँ से करीब 250 सौ किलो मीटर पैदल चलकर सियाचिन बेस कैंप पहुँचना पड़ता है। पंद्रह दिन लगते हैं। वहाँ मेडिकल होता है।* *फिट हुए तो सेना की तरफ़ से यूनिफॉर्म, जूते, गर्म कपड़े, हेलमेट सब मिलता है। फिर तीन-चार महीने वहीं रहकर काम करते हैं।”*
*बर्फ़ से ढके पहाड़ अब पीछे छूट चुके थे, लेकिन टूरिस्ट की निगाहें उस कहानी में उलझ चुकी थी।*
*“वहाँ काम क्या करना पड़ता है ?” उसने धीरे से पूछा।*
*“सामान ढोना,” युवक बोला,*
*“जो भी ज़रूरी सामान होता है, आर्मी उसे एयरड्रॉप करती है। हम लोग उसे उठाकर एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट तक पीठ पर लादकर पहुँचाते हैं।”*
*“गाड़ियाँ क्यों नहीं इस्तेमाल होतीं ?”*
*“वह इलाका पूरा ग्लेशियर है। ट्रक नहीं चल सकते। आइस स्कूटर हैं, लेकिन वे शोर करते हैं। शोर हुआ तो दुश्मन की तरफ़ से गोलियाँ चल सकती हैं। इसलिए हम रात के लगभग 2 बजे निकलते हैं। टॉर्च भी नहीं जला सकते। चुपचाप, अंधेरे में। वहाँ न घोड़े टिक सकते हैं, न खच्चर।* *माइनस 50 डिग्री और 18 हज़ार फीट की ऊँचाई पर कोई जानवर ज़िंदा नहीं रह सकता।”*
*टूरिस्ट ने भारी स्वर में कहा—*
*“लेकिन वहाँ ऑक्सीजन भी कम होती है। इतना बोझ कैसे उठा लेते हैं?”*
*“इसीलिए साहब, पंद्रह किलो से ज़्यादा नहीं उठा सकते। और दिन में सिर्फ़ दो घंटे काम। बाक़ी समय शरीर को ज़िंदा रखने की कोशिश।”*
*“यह तो जानलेवा काम है…”*
*युवक कुछ पल चुप रहा, फिर बोला-*
*“हाँ, कई दोस्त लौटकर नहीं आए। कोई गहरी खाई में गिर गया, कोई दुश्मन की गोली से मारा गया। और सबसे बड़ा ख़तरा—फ्रॉस्टबाइट। वहाँ मौत हर वक़्त साथ चलती है। एक तरह से…मौत तो तय ही है।”*
*टूरिस्ट ने आख़िरी सवाल किया-*
*“तो इसके बदले आपको अच्छी तनख़्वाह मिलती होगी ?”*
*युवक ने बिना किसी गर्व के कहा-*
*“18 हज़ार रुपये महीने। लेकिन पूरा खर्च सेना उठाती है। तो तीन महीने में पचास हज़ार के आसपास बच जाते हैं। मेरे लिए यही बहुत है। घर चलता है।* *बेटियों की पढ़ाई में मदद हो जाती है और सबसे बड़ी बात, देश और सेना के लिए कुछ करने का संतोष।”*
*दिल्ली का वह टूरिस्ट चुप हो गया। पचास लाख के पैकेज, एसी दफ़्तर और लग्ज़री ज़िंदगी के बीच खड़ा वह इंसान, पहली बार खुद को छोटा महसूस कर रहा था।*
*यहाँ-*
*माइनस 50 डिग्री,*
*18 हज़ार 875 फीट की ऊँचाई,*
*सुबह 2 बजे,*
*मौत की परछाईं के साथ-*
*600/ सौ रुपये रोज़ की कमाई “बहुत” लगती है।*
*और देश के लिए कुछ करने का भाव सबसे बड़ी दौलत...*
*शहरों में बैठकर ज्ञान बाँटने वाले, सोशल मीडिया पर ज़हर उगलने वाले, व्यूज़ और लाइक्स के लिए चिल्लाने वाले, उनमें से किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि उस अंधेरे, बर्फ़ीले सन्नाटे में दस मिनट भी खड़ा रह सके, जहाँ यह लद्दाखी युवक 15 किलो बोझ उठाकर मुस्कुराते हुए देश की सेवा करता है।*
*आप अपने बच्चे को लग्ज़री कार में घुमाइए, मॉल में शॉपिंग कराइए, एसी रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा–पास्ता खिलाइए। यह उसका हक़ है।*
*लेकिन कभी-बस कभी, उसे यह कहानी भी सुनाइए.....*
*ताकि उसे पता चले कि इस देश की असली रीढ़ कहाँ खड़ी है।*
*एक हफ्ते की पारिवारिक यात्रा में सुनी गई यह बातचीत छोटी थी,*
*लेकिन इसके शब्द—दिल में बहुत गहरे उतर गए।*
*कहानी का संदेश और अपील...*
*यह कहानी किसी एक लद्दाखी युवक की नहीं है, यह उस भारत की कहानी है जो कैमरों से दूर, सुर्खियों से बाहर, बर्फ़, अंधेरे और मौत के बीच खड़ा होकर हमें सुरक्षित रखता है। यह हमें याद दिलाती है कि देश सिर्फ़ भाषणों, ट्रेंडिंग हैशटैग्स और सोशल मीडिया की बहसों से नहीं चलता, बल्कि उन गुमनाम हाथों से चलता है जो माइनस 50 डिग्री में भी कांपते नहीं, बल्कि बोझ उठाते हैं।*
*हम अक्सर सुविधाओं, पैकेज, लाइक्स और फॉलोअर्स को सफलता का पैमाना मान लेते हैं, लेकिन असली राष्ट्र निर्माण वहाँ होता है जहाँ कोई इंसान अपनी जान की क़ीमत पर भी कर्तव्य निभाता है, बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी दिखावे के।*
*18 हज़ार रुपये की तनख़्वाह उस साहस, उस त्याग और उस जोखिम का मूल्य नहीं हो सकती, जो वह लद्दाखी युवक हर सर्दी में उठाता है।*
🙏*अपील यही है-*
*सरकार और व्यवस्था ऐसे गुमनाम योद्धाओं को सिर्फ़ “कॉन्ट्रैक्ट वर्कर” न माने, बल्कि उन्हें सम्मान, सुरक्षा, बीमा और बेहतर भविष्य दे।*
*समाज उन्हें सिर्फ़ कहानी बनाकर आगे न बढ़ा दे, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञता और संवेदनशीलता रखे।*
*और हम सब, ख़ासकर अपने बच्चों को, यह समझाएँ कि देशभक्ति सिर्फ़ नारे लगाने या स्क्रीन पर बहस करने से नहीं आती, बल्कि त्याग, अनुशासन और कर्तव्य से आती है।*
*जब अगली बार हम आरामदेह कमरे में बैठे हों, तो एक पल ठहरकर उन लोगों को याद करें जो रात के 2 बजे, अंधेरे और बर्फ़ के बीच, हमारी शांति का बोझ अपनी पीठ पर उठाए खड़े हैं।*
*क्योंकि अगर वे हैं, तभी हम हैं।*
🇮🇳🚩 *वन्देमातरम्* 🚩🇮🇳
(व्हाट्सएप ग्रुप पर बिना नाम के यह मर्मस्पर्शी आलेख प्राप्त हुआ, तो लगा यह लोगों तक अवश्य पहुँचना चाहिए। यदि किसी को इसके मूल लेखक का नाम ज्ञात हो तो कृपया बताएँ ताकि उन्हें आभार दिया जा सके।
🙏🇮🇳 🇮🇳 🚩 🇮🇳 🇮🇳🙏

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