उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से जुड़े यूजीसी के नियम
उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से जुड़े यूजीसी के नियम
समता संबंधी नियमों में बदलावों की जरूरत हो सकती है, लेकिन ये आवश्यक हैं
गुरुवार को, सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने हेतु नियमों’ को “बहुत व्यापक” करार देकर उन पर रोक लगा दी। जनवरी में अधिसूचित इन नियमों ने परिसरों में भेदभाव के सभी रूपों, खासकर जाति-आधारित, से निपटने की कोशिश की। वर्षों के सक्रियतावाद (एक्टिविज्म), मुकदमेबाजी और राष्ट्र के जमीर को झकझोर देने वाली रोहित वेमुला जैसी दुखद आत्महत्याओं के बाद ये नियम लाये गये। शीर्ष अदालत ने यूजीसी को इन्हें बनाने का आदेश दिया था। इस मुद्दे पर साल 2012 के यूजीसी फ्रेमवर्क को उच्च शिक्षा संस्थानों ने लगभग पूरी तरह अनदेखा कर दिया था। जाति और जाति-आधारित भेदभाव एक हकीकत है जो अब भी बरकरार है और इससे निपटना राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक प्राथमिकता होनी चाहिए। बहुत से विद्यार्थियों ने इसे भुगता है, जिससे उन्हें जीवन भर के जख्म मिले हैं और कई बार जिंदगी तक बर्बाद हो गयी है। यूजीसी के आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसी शिकायतों की तादाद पिछले पांच सालों में दोगुनी से ज्यादा हो गयी है। मसौदा नियम चर्चा के लिए पिछले साल सार्वजनिक किये गये और इन नियमों को बदलावों के साथ अधिसूचित किया गया है। एक दलील यह है कि नये नियमों में साल 2012 के उस फ्रेमवर्क को हल्का कर दिया गया है, जिसमें भेदभाव के कहीं ज्यादा और तुरंत ध्यान देने योग्य रूपों की शिनाख्त की गयी थी, और एससी/एसटी समुदाय के विद्यार्थियों द्वारा झेली जाने वाली समस्याओं, जैसे कि आरक्षण मानदंडों को पूरा नहीं करना, से निपटने के लिए अलग सेक्शन थे। लेकिन नये नियम इस मायने में अलग हैं कि ये समान अवसर केंद्रों, समता कमेटियों, समता हेल्पलाइनों व दस्तों की स्थापना तथा जांच कमेटियों में बेहतर निगरानी, देखरेख और नुमाइंदगी के जरिए समयसीमा के भीतर शिकायत समाधान को लागू करना चाहते हैं। किसी उच्च शिक्षा संस्थान द्वारा गैर-अनुपालन की सूरत में यूजीसी की कार्रवाई हो सकती है, जिससे अनुपालन बढ़ सकता है।
उत्तर भारत के कई हिस्सों में परिसरों में दो आधार पर नये नियमों का विरोध देखा गया है। ये नियम केवल एससी/एसटी और ओबीसी के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव को परिभाषित करते हैं और झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है। एक स्तर पर, पहला आधार सामान्य श्रेणी के विद्यार्थियों के लिए अन्यायपूर्ण लग सकता है जो न्याय पाने के अवसर से वंचित कर दिये गये दिखते हैं। यह खुद जाहिर है कि जाति-आधारित भेदभाव ज्यादातर सिर्फ निचली जातियों के साथ है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस सुस्पष्ट परिभाषा को छोड़ देने पर विचार कर सकता है। जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट का मूल निर्देश आया उसके संदर्भ में राजनीतिक संकेतन (पोलिटकल सिग्नलिंग) कमजोर पड़ सकता है, लेकिन नये नियमों के समग्र लक्ष्य को पाने के लिए इस पर विचार किया जा सकता है। इसके अलावा, साल 2025 के मसौदा नियमों में झूठी शिकायतों से निपटने के प्रावधान भी थे। उन्हें दोबारा शामिल करने का असर हाशियाई तबकों से आने वाले शिकायतकर्ताओं के लिए डराने वाला हो सकता है। लेकिन एक समाधान यह सुनिश्चित करना हो सकता है कि केवल उन्हीं शिकायतों पर कार्रवाई हो जो किसी को फंसाने की मंशा से की गयी साबित हों, न कि उन सभी शिकायतों पर जो भेदभाव साबित करने में बस नाकाम हुई हों।
COURTESY - THE HINDU



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें